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विज्ञान और कला: एक लघु कथा

एक रात, कवि वैज्ञानिक के पास पहुँच गया। कवि के कपडे पुराने, गंदे और उथल पुथल थे। उसके हाव भाव उडे उडे से थे। उसने वैज्ञानिक से कहा, "काव्य, कला से मेरा मोहभंग हो गया है। मेरी कला मे अब कोई आस्था नही रह गयी है। मुझे अब विज्ञान सीखना है!"

"अच्छी बात है," वैज्ञानिक ने कहा। "तुम आज से मेरे मेहमान हो."

कवि को वैज्ञानिक का यह प्रस्ताव बहुत पसंद आया। उसने वैज्ञानिक का आभार प्रकट किया और वहीं ठहर गया।

कवि एक अच्छा शिष्य साबित हुआ। वैज्ञानिक को भी उसे सिखाने मे आनंद आने लगा था। सत्य यह था कि दोनो ही जिज्ञासू थे। एक दिन वैज्ञानिक ने कवि से कहा, "मै गूढतम से गूढतम रहस्य के भीतर झांक सकता हूँ। और अगर ऐसा कुछ है भी जो मै नही देख सकता या नही देख सका तो भी भावी पीढ़ी मेरी शुक्रगुजार रहेगी। यदि वे अंतिम सत्य को जान सके।"

वैज्ञानिक आमतौर पर इस प्रकार की बातें नही करता था। अमूमम वह काम करता रहता था, जोड घटाना, बडबडाना और पता नही क्या क्या -- बोलता कम था।

कवि ने उसकी बहुत सहायता की। उसने वैज्ञानिक के काम की सराहना की। लेकिन एक दिन कुछ असामान्य घटा। वैज्ञानिक ने देखा कि कवि उसकी प्रयोग शाला मे बैठा एक किताब पढ रहा था।

"तुम क्या पढ रहे हो?" वैज्ञानिक ने कवि से पूछा। उसने कवि से वह किताब ले ली। उसने देखा कि वह एक कविता की किताब थी। वैज्ञानिक बेहद ख़फ़ा हो गया। उसने कहा, "तुम आज के बाद से मेरे शिष्य नही रहे। क्या तुम भूल गये कि तुम्ही ने कहा था कि तुम्हारा कला पर से विश्वास उठ गया है? तुम्हारे जैसा इंसान विज्ञान के किसी काम का नहीं। निकल जाओ मेरे घर से।"

कवि ने वैज्ञानिक की तरफ मुस्करा कर देखा और कहा, "क्योकि अब आपने मुझे विज्ञान सिखा दिया है, इसलिये मुझे अपनी खोयी हुई आस्था पुन: मिल गयी है। अलविदा।"

कविता की अपनी किताब को अपने हाथों मे थामे वह प्रयोगशाला से बाहर निकल गया।

लेखक: प्रसिद्ध हंगेरियल लेखक गेजा साथ।
हिंदी मे अनुवाद स्वप्निल भारतीय द्वारा

रचनाकार: 


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by Dr. Radut.