वाद

प्रतिवाद :- "यहाँ‌ शोध मे बहु-पत्नियों का जिक तो खैर नही किया गया है इस लिये उस पर कोई टिप्प्णी नहीं। अब आते है तार्किक्ता पर। खेतिहर पुरूष और शिकारी तथा घूमन्तू पुरूष मे समसे बडा अंतर है स्थायित्व। जहाँ घुमन्तु पुरूष...

प्रतिवाद

इससे पूर्व की हम बात आगे बढायें, आपको इस नये स्तंभ की थोडी जानकारी दे दें। हम रचनायें प्रकाशित करते हैं‌, उन्हे पढते हैं लेकिन उनका समालोचनात्मक विश्लेषण नही होता है। ब्लागिगं जगत की तू मेरी पीठ खुजा मै तेरी प्रवत्ति कल्किआन मे वर्जित है। इसीलिय...

अनजान पड़ोसी

राकेट की उड़ान में केवल तीन घंटे बाकी थे। उल्टी गिनती काफी देर पहले आरम्भ हो चुकी थी। इस उड़ान से सम्बन्धित सभी वैज्ञानिकों के चेहरों पर एक तनाव था क्योंकि यह आशंका सभी के मन में थी कि पता नहीं यह उड़ान सफल होगी या नहीं।


यह देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण क्षण था क्योंकि पहले बार राकेट प्रक्षेपण में परमाणु ऊर्जा का उपयोग किया गया था और इसकी सफलता का अर्थ था, अंतरिक्ष की ओर बढ़ने में एक लम्बी छलांग। किन्तु इस कार्यक्रम से सम्बन्धित तीन ऐसे वैज्ञानिक भी थे जिनके चेहरे पर तनाव के अतिरिक्त घोर परेशानी के भी लक्षण थे। ये थे कार्यक्रम के इंचार्ज प्रो. भास्कर और उनके दो सहयोगी। क्योंकि अन्तिम निरीक्षण के समय अभी-अभी कम्प्यूटर ने एक गड़बड़ी की सूचना दी थी।

"मेरा विचार है कि उड़ान फिलहाल रद्द कर दी जाए। जब तक गड़बड़ी ठीक नहीं हो जाती हम राकेट को लांच नहीं कर सकते।" एक सहयोगी ने कहा।

"किन्तु उड़ान रद्द करने का अर्थ है कि सम्पूर्ण सिस्टम की फिर से तैयारी जिसमें हमें कम से कम तीन माह लग जायेंगे और साथ ही साथ खर्च भी बहुत बढ़ जायेगा।" प्रो. भास्कर ने समस्या बतायी।

"फिर क्या उपाय हो सकता है? यदि हम इस गड़बड़ को ठीक करने में जुट जायें तब भी कम से कम छह-सात घंटे लग जायेंगे।" दूसरे सहयोगी ने कहा।

"हाँ! क्योंकि यह गड़बड़ उस गणना में है जो हमने कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए की थी। यदि यह प्रोग्रामिंग सही हो जाये तो राकेट लांचिग ठीक हो सकती है। किन्तु समस्या यह है कि गणना की गड़बड़ मालूम करने और फिर उसे ठीक करने के लिए समय चाहिए या फिर कोई ऐसा तेज दिमाग व्यक्ति हो जो कम्प्यूटर की तरह कलकुलेशन कर सके।"

"एक व्यक्ति ऐसा है जो यह काम कर सकता है" पहले सहयोगी की आँखों में चमक आ गयी।

"कौन है वह?" प्रो. भास्कर ने पूछा।

"प्रोफेसर राजकुमार। गणित के जाने माने विद्वान और हमारा सौभाग्य है कि इस समय वे इसी शहर में हैं।"

"ठीक कहा तुमने। हम लोगों को समय नष्ट न करके तुरंत उनके पास चलना चाहिए।" प्रो. भास्कर ने कहा और तीनों उठकर प्रो. राजकुमार से मिलने रवाना हो गये।

नगर के प्रसिद्ध होटल के एक कमरे में प्रो. राज का निवास था। उन्होंने तीनों को वहीं बुला लिया।

"हैलो प्रोफेसर राज!" प्रो. भास्कर ने मुस्कुराते हुए उनकी ओर हाथ बढ़ाया किन्तु प्रो. राज ने उनके बढ़े हुए हाथ पर कोई ध्यान नहीं दिया और न ही उनके चेहरे पर कोई भाव उभरा था। केवल उन्होंने तीनों को एक ओर पड़ी कुर्सियों पर बैठने का संकेत किया। प्रो. भास्कर ने शर्मिंदा होकर हाथ खींच लिया और अपने सहयोगियों के साथ कुर्सियों की ओर बढ़ गये।

"क्या समस्या है?" प्रो. राज ने भी बैठते हुए कहा। उनका चेहरा पहले की तरह सपाट था।

प्रो. भास्कर ने पहले तो प्रो. राज का सपाट चेहरा देख कर समझा कि शायद वे उनकी समस्या हल करने के लिए तैयार न हों किन्तु जब उन्होंने समस्या बताई तो प्रो. राज तुरन्त चलने के लिए तैयार हो गये। चारों व्यक्ति वापस आ गये और आने के साथ ही प्रो. राज तुरन्त प्रो. भास्कर के साथ कम्प्यूटर की ओर बढ़ गये। उनकी चाल अजीब सी थी। लगता था मानो कोई रोबोट मशीनी अंदाज में गति कर रहा हो। थोड़ी देर बाद प्रो. राज की उंगलियाँ कम्प्यूटर के कीबोर्ड से खेल रही थीं। फिर केवल दो मिनट बाद वे यह कहते हुए उठ खड़े हुए, "गलती ठीक हो गयी।"

"इतनी जल्दी।" प्रो. भास्कर आश्चर्य से चीख उठे, "किन्तु किस प्रकार?"

"थोड़ी देर बाद कम्प्यूटर प्रिंट आउट पर देख लेना मैं चलता हूँ। अभी एक दूसरी समस्या का हल खोजना है।" प्रो. राज मशीनी अंदाज में दरवाजे की ओर बढ़ गये। प्रो. भास्कर और उनके सहयोगी आश्चर्य से उन्हें जाते देखते रहे। विस्मय के कारण उनके मुँह से कोई अवाज नहीं निकल सकी। फिर ठीक समय पर राकेट अंतरिक्ष की ओर रवाना हो गया और यह उड़ान आशा से अधिक सफल रही।

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प्रो. राज ने टैक्सी ली और अपने घर की ओर रवाना हो गए। अभी अभी फ्लाइट से वे अपने शहर में उतरे थे। कुछ देर बाद जब उनकी टैक्सी घर के सामने आकर रूकी तो उन्होंने देखा कि घर के सामने काफी भीड़ लगी है। जब लोगों की दृष्टि टैक्सी से उतरते प्रो. राज पर पड़ी तो भीड़ में कानाफूसी होने लगी और कई लोग उनकी ओर बढ़े।
"क्या बात है?" प्रो. राज के प्रश्न में न कोई आश्चर्य था और न उत्सुकता। वे लोग कुछ क्षण मौन रहे। उनके चेहरे पर अजीब सी उदासी छायी थी। फिर उनमें से एक व्यक्ति आगे बढ़ा जो प्रो. राज का पड़ोसी था।

"आप मेरे साथ आइए प्रोफेसर साहब।" उसने उनका हाथ पकड़ा और आगे बढ़ चला। भीड़ ने तुरन्त उन्हें रास्ता दे दिया। जब वे घर के प्रांगण में पहुंचे तो वहां प्रो. राज ने देखा कि सफेद चादर के नीचे शायद कोई सो रहा था। प्रो. राज के पड़ोसी ने उन्हें उस ओर संकेत किया और प्रोफेसर ने आगे बढ़ कर चादर पलट दी। चादर के नीचे उनकी इकलौती बेटी खून में लथपथ पड़ी थी। प्रो. राज ने नब्ज़ पर उंगली रखी किन्तु वहां कुछ न था।

"एक कार एक्सीडेंट में थोड़ी देर पहले...." पड़ोसी की आवाज भर्रा गयी।

"इसका अंतिम संस्कार कर दो, यह मर चुकी है।" प्रो. राज का सपाट स्वर उभरा और पूरी भीड़ हक्का बक्का रह गयी। उन्हें प्रो. राज की ऐसी प्रतिक्रिया की आशा नहीं थी।

"मुझे एक समस्या हल करनी है। मैं अपने स्टडी रूम में जाता हूँ।" कहते हुए वह अन्दर बढ़ गये। भीड़ आश्चर्य से उन्हें जाता देखती रही। फिर एक कोने में बैठी उनकी पत्नी आँसू पोंछती हुई उठी और उनके पीछे-पीछे चल पड़ी। अपने पीछे कदमों की चाप सुनकर प्रोफेसर ने पीछे मुड़कर देखा किन्तु बिना कुछ कहे चलते रहे। स्टडी रूम में पहुंच कर वे कुर्सी पर बैठ गये और एक किताब उठा ली। उसी समय उनकी पत्नी ने किताब छीनकर दूर फेंक दी।

"वह किताब फट सकती थी" प्रोफेसर ने शांत स्वर में कहा।

"किताब के फटने की इतनी परवाह किन्तु अपनी बच्ची के लिए कोई भावना नहीं। क्या हो गया है तुम्हें। पिछले पाँच वर्षों में मैने न तो तुम्हें हंसते देखा, न क्रोध करते, न प्रसन्न होते और न ही दु:खी होते देखा। कहां गयी तुम्हारी सारी भावनाएं और संवेदनाएं। इतने कठोर कैसे हो गये तुम?" उनकी पत्नी मानो फट पड़ी थी।

"तुम कहना क्या चाहती हो?" एक लम्बी सांस लेकर प्रोफेसर ने भावहीन चेहरे के साथ पूछा।

"मैं केवल यह कहना चाहती हूँ कि मशीनों के साथ काम करते करते तुम स्वयं एक मशीन बन गये हो और मैं एक मशीन के साथ अपना जीवन नहीं बिता सकती। मुझे राज नाम का इंसान चाहिए। एक जीता जागता इंसान जो पाँच वर्ष पहले था जब तुम गुमनामी के अंधेरे में खोये थे।" अंतिम शब्द कहते-कहते उसकी आवाज भर्रा गयी।

प्रो. राज ने उसकी ओर देखा और इस प्रकार बोले मानो किसी सपने में बोल रहे हों, "मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ कि मेरी भावनाएं कहां गायब हो गयीं। किन्तु इसके लिए मुझे थोड़ा समय चाहिए। तुम नीलम का अंतिम संस्कार करा दो फिर आज रात को यहीं पर मैं तुम्हे पूरी कहानी सुनाऊँगा। अब जाओ।" उसने एक दूसरी किताब उठा कर अपना चेहरा उसके पीछे छुंपा लिया।

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"यह कहानी पांच वर्ष पहले की है जब मैं बी.ए. तृतीय वर्ष में था। मुझे गणित विषय एक हौवा की तरह लगता था ओर उसके सवाल हल करना मेरे लिए पहाड़ उठाने के समान था। कभी भी मैं उसमें अच्छे नम्बर नहीं ला पाया। मैं सोचता था कि काश कोई ऐसा करिश्मा हो जाये जिससे गणित और विज्ञान में मैं मास्टर हो जाऊँ। इसके लिए मैं साधु सन्तों से भी अक्सर मिलता जुलता रहता था। एक दिन मुझे मालूम हुआ कि शहर के बाहर जंगल में कोई महात्मा जी आये हैं जिनसे मांगने पर किसी की भी मनोकामना पूरी हो जाती है। मैं तुरन्त उनसे मिलने जंगल की ओर चल पड़ा।

जब मैं जंगल में काफी देर चलता रहा और महात्मा जी नहीं मिले तब मुझ पर यह राज़ खुला कि रात के अंधेरे में मैं रास्ता भटक गया हूँ। मैंने वापस मुड़ना चाहा किन्तु वापसी का भी रास्ता नहीं मिला। अन्त में थक हार कर मैंने वहीं एक पेड़ पर रात बिताने की सोची।
पेड़ की एक डाल पर मैने डेरा जमाया और जल्दी ही मुझे नींद आ गयी। आधी रात को लगभग 12 बजे एक तेज सीटी की आवाज ने मेरी आँखें खोल दीं। मैं यह देखकर दंग रह गया कि पूरे जंगल में तेज प्रकाश फैला हुआ था और यह प्रकाश एक ऐसी गोल वस्तु से निकल रहा था जो आकाश में तेजी से चक्कर काटती नीचे उतर रही थी।

मैंने उड़नतश्तरियों के बारे में काफी पढ़ रखा था, हो ना हो यह कोई उड़नतश्तरी है। मैंने सोचा। डर और रोमांच के कारण एकाएक मुझे कंपकपी आ गयी थी। उड़नतश्तरी धीरे से पृथ्वी पर उतरी और एकाएक उसका तीव्र प्रकाश गायब हो गया। अब हल्का हल्का लाल प्रकाश उसके चारों ओर चक्कर लगा रहा था। अचानक वहां एक आवाज़ गूँजी, "पेड़ पर बैठे मनुष्य तुम जो कोई भी हो, नीचे उतर आओ। मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ।"

मेरी सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी, किन्तु फिर साहस बटोरकर मैने पूछा, "कौन हो तुम?"

"यह तुम्हें मालूम हो जायेगा। मैं तुमसे जो बात करना चाहता हूँ उसमें हम दोनों का भला है।"

"मैं कुछ देर अनिश्चय की अवस्था में रहा फिर सारी आशंकाओं को त्यागते हुए नीचे उतर आया। मैं अब उड़नतश्तरी की ओर घूर रहा था। अचानक किसी ने पीछे से मेरे कंधे पर हाथ रखा। मै चौंक कर पीछे मुड़ा तो वहां एक अजीब प्राणी खड़ा था। उसके काले शरीर से हल्का प्रकाश फूट रहा था और वह ठीक किसी रोबोट की तरह लगता था।

"कौन हो तुम?" मेरे मुंह से निकला।

"तुम्हारी ही पृथ्वी का एक वासी।" वह बोला।

 "मैने तुम्हारे जैसे मनुष्य के बारे में न कहीं सुना और न कहीं देखा।" मैने कहा।

"यह बात सत्य है कि दुनिया मेरे बारे में पूरी तरह अन्जान है। दरअसल मैं बाहरी पृथ्वी का निवासी न होकर भीतरी पृथ्वी का निवासी हूँ।"

"मैं कुछ समझा नहीं।" मेरी समझ में वास्तव में कुछ भी नहीं आया था।

"बात यह है कि यह पृथ्वी की ऊपरी सतह है जिसपर तुम लोगों का जन्म हुआ है। यह पृथ्वी का एक ऐसा गोला है जो अन्दर से एक सीमा तक खोखला है। जिस प्रकार बाहरी तत्वों से तुम्हारा निर्माण हुआ उसी प्रकार भीतरी खोखले गोले के अन्दर प्रकृति ने हम लोगों का निर्माण वहां की आग और तपती हुयी धातुओं से किया है। इस प्रकार हम तुम पड़ोसी हुए।"

"किन्तु तुम यहां कैसे पहुँचे?" मैं उसकी बात पर दंग रह गया था।

"हम लोगों ने विज्ञान में तरक्की करके यह विशेष यान बनाया।" उसने उड़नतश्तरी की ओर संकेत किया, "फिर ठीक दक्षिणी ध्रुव के नीचे से सुरंग बनाकर बाहर निकल आये। एक आवश्यकता ने हमें बाहर निकलने पर मजबूर किया है।"

"कैसी आवश्यकता?" मैने पूछा।

"हालांकि प्रकृति ने हमें एक तेज मस्तिष्क का मालिक बनाया है। जो काम तुम्हारे तीव्र गति कम्प्यूटर कई घंटों में करेंगे उसे हमारा मस्तिष्क सेकेण्डों में कर देता है। किन्तु इस मस्तिष्क निर्माण में प्रकृति से एक भूल हो गयी। हमारा मस्तिष्क भावना रहित है। अर्थात न तो हम हंस सकते हैं, न तो प्रसन्न हो सकते हैं और न ही किसी से प्रेम या घृणा कर सकते हैं। किन्तु अब हमने कड़ी मेहनत से एक ऐसा यंत्र बना लिया है जो भावनाओं को हमारे मस्तिष्क में प्रत्यारोपित कर सकता है।" कह कर वह कुछ क्षण के लिए चुप हो गया।

"किन्तु पृथ्वी के ऊपर आपको क्या आवश्यकता खींच लायी?" मैं अब भी उसकी बात नहीं समझा था।

"वही बताने जा रहा हूँ। बात यह है कि उस यंत्र को काम करने के लिए किसी बाहरी मनुष्य की भावनाओं की आवश्यकता है। वह यंत्र उन भावनाओं को ग्रहण करके उन्हें हमारे अनुरूप बना देगा। फिर उसकी कई कापियां बनाकर हम सभी के मस्तिष्क में प्रत्यारोपित कर देगा। मैं अब उसकी बात थोड़ी थोड़ी समझ रहा था और एक आशंका ने मेरे मन में घर करना आरम्भ कर दिया था।

"तो कोई ऐसा मनुष्य मिला?" मैने पूछा।

"हां। वह मनुष्य तुम हो सकते हो यदि तुम इसके लिए तैयार हो जाओ।"

"किन्तु इसके बाद तो मैं स्वयं भावनाहीन हो सकता हूँ।" मैंने कहा।

"हां। इसके बाद तुम्हारा मस्तिष्क भावनाओं से खाली हो जायेगा। किन्तु इसके बदले में हम तुम्हें उपहार देंगे। मस्तिष्क का जो भाग भावनाएं देने के बाद खाली होगा, वहां हम एक ऐसी पावर भर देंगे कि तुम्हारा मस्तिष्क पूरे विश्व में अद्वितीय हो जायेगा। फिर दुनिया का कोई व्यक्ति बुद्धि में तुम्हारी बराबरी नहीं कर सकेगा" उसने मेरी आँखों में देखते हुए कहा। अब मेरे सामने दो रास्ते थे। या तो मैं दुनिया का सबसे जीनियस व्यक्ति बन जाता और या फिर एक आम संवेदनशील इन्सान। काफी देर सोचने के बाद मैंने पहला रास्ता चुना। क्योंकि यह मेरी पहले से अभिलाषा थी जो इस रूप में पूरी होने जा रही थी। मेरे हामी भरते ही वह मुझे अपने यान के अन्दर ले गया जहां मेरी भावनाओं का गणना शक्ति से आदान प्रदान हो गया और कुछ ही देर बाद मैं दुनिया का सबसे जीनियस किन्तु भावना रहित व्यक्ति बन गया था।
"यान मुझे वहीं छोड़कर वापस पलट गया। वह दिन और आज का दिन अब मैं विश्व का एक जाना माना गणितज्ञ हूँ।"

प्रोफेसर राज ने अपनी दास्तान समाप्त की उसकी पत्नी सामने बैठी गौर से उसे सुन रही थी। उसकी पलकों ने झपकना तक छोड़ दिया था। प्रोफेसर राज के मौन होते ही मानो वह अपने होश में आ गई। कुछ क्षण चुप रहने के बाद बोली, "मुझे नहीं मालूम था कि इस सफलता को पाने के लिए तुमने इतनी बड़ी कुर्बानी दी है। तुम महान अवश्य हो किन्तु मनुष्य नहीं।" उसने मुँह फेर लिया। शायद वह अपनी आँखों में आये आँसुओं को प्रोफेसर राज से छुपाना चाहती थीं।"
 

अच्छि रचना है!

अच्छि रचना है!

kahani ke roop me aaj ki

kahani ke roop me aaj ki haqikat,aaj insaan sab hone ke baad bhavana shunya hi to hota ja raha hai.sunder rachana.par samay aur patro ke taalmel par thoda aur dhyan dena jaroori hai.