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मजबूर आसमां

यह शहर अपनी जगमगाती रोशनियों के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध था। अनेकों मल्टीनेशनल कंपनियों के आफिस इस शहर में मौजूद थे। देश की अर्थव्यवस्था में दिल की तरह चौबीस घण्टे धड़कता रहता था यह शहर।
इसी शहर के मध्य में यह गन्दी बस्ती चाँद में लगे हुए बदनुमा धब्बे की तरह मौजूद थी। जहाँ के लोग दो रोटी के जुगाड़ के लिए रोजाना दो सौ जन्म लिया करते थे। अपनी बस्ती को बड़े पूंजीपतियों और बिल्डर्स के कदमों से बचाने के लिए अक्सर उन्हें बुलडोज़र के सामने भी लेटना पड़ता था।

दोपहर की तेज चिलचिलाती धूप में यही बस्ती इस समय एक बड़ी लाइन के रूप में नज़र आ रही थी। इस लाइन के ठीक सामने एक विशालकाय गाड़ी मौजूद थी। जिसपर विश्व की जानी मानी फूड कंपनी `ईट-एन-ज्वाय´ का लोगो लगा हुआ था।
इस गाड़ी के सामने लम्बी लाइन लगने का कारण भी साफ था। आज कंपनी का स्थापना दिवस था, और इस अवसर पर वह इस गरीब बस्ती में फ्री आटे के पैकेट बांट रही थी। जिसकी पब्लिसिटी का भी पूरा इंतिजाम था।
घण्टों चलने के बाद यह प्रोग्राम पूरी कामयाबी के साथ खत्म हुआ। बस्ती का कोई व्यक्ति आटे का पैकेट पाने से वंचित नहीं रहा था।

"कलुआ, ओ कलुआ।" उसी बस्ती में कलुआ की झोंपड़ी के सामने खड़ा मेवालाल उसे आवाज दे रहा था।
कलुआ झोंपड़ी से बाहर निकला, "क्या बात है मेवालाल?"
"मेरे घर का आटा खत्म हो गया है। जरा एक कटोरी दे दो।"
"मेरे घर में भी खत्म होने वाला है। मैं नहीं दे सकता।" कलुआ ने इंकार कर दिया।
"अगर रखा है तो थोड़ा दे दो।"
"रखा तो है, लेकिन मैं दूँगा नहीं।"
"आटा तो तुम्हें देना ही पड़ेगा।"
"अगर मैं न दूं तो क्या कर लोगे तुम!" गुस्से में कलुआ ने मेवालाल को घूरा।
"बताऊँ!" मेवालाल ने अचानक कमर में लगा हुआ गंडासा खींचा और कलुआ की गर्दन पर वार किया। दूसरे ही पल कलुआ खून में नहाया ज़मीन पर पड़ा हुआ लोट रहा था।
यह दृश्य देखकर आसपास खड़े लोगों से बर्दाश्त नहीं हुआ और वे मेवालाल पर पिल पड़े। शायद उन सब पर भी शैतान सवार हो गया था। क्योंकि वे बुरी तरह मेवालाल को पीट रहे थे।
देखते ही देखते मेवालाल भी लाश में बदल गया।
दूर पुलिस का सायरन सुनाई पड़ रहा था।

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पुलिस अधिकारियों की ये मीटिंग फाइव स्टार होटल के एक वातानुकूलित कमरे में कमिश्नर ने आयोजित की थी। ए.सी. की ठंडक में भी अिधकारियों के चेहरे पसीने से भीगे हुए थे। और इसकी वजह भी थी।
दरअसल शहर की गंदी बस्ती में जबरदस्त मार काट मची हुई थी। वहाँ के लोगों पर जैसे शैतान सवार हो गया था। हर तरफ एक फसाद बरपा था।
"मैं पूछता हूं, आप लोग दंगों को कण्ट्रोल क्यों नहीं कर पा रहे हैं।" थोड़ी देर की खामोशी के बाद कमिश्नर को तैश आ गया।
"मैं तो पहले ही कह रहा था कि इस तरह की गंदी बस्तियां शहर में रहनी ही न चाहिए। पता नहीं कहां कहां से चले आते हैं लोग हमारे शहर में गंदगी फैलाने।" एक इंस्पेक्टर जो वहीं का लोकल निवासी था, अपनी नाक सिकोड़ते हुए बोला।
"इस देश का हर नागरिक देश में कहीं भी बसने के लिए आजाद है। संविधान के खिलाफ मत बोलो।" कमिश्नर ने उसे डपटा। इंस्पेक्टर सकपकाकर चुप हो गया।
"कोई किसी काम का नहीं है।" कमिश्नर सबको घूरते हुए उठ खड़ा हुआ। फिर वह एक इंस्पेक्टर की तरफ मुड़ा,"इं.विशाल, तुम मेरे साथ आओ।"
इंस्पेक्टर विशाल उठा और कमिश्नर के साथ चलते हुए दूसरे कमरे में पहुँच गया जहाँ और कोई नहीं था।
"इं. विशाल, इससे पहले कई केस तुमने सफलतापूर्वक हल किये हैं। इसलिए मुझे उम्मीद है कि बस्ती में शांति स्थापित करने और झगड़ों की तह तक जाने में तुम कामयाब होगे।"
"मेरी पूरी कोशिश होगी सर!" इं.विशाल ने हल्का सा सर झुकाया।

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विशालकाय पर्वतों के बीच यह गुफा शायद ही किसी को नजर आ सकती थी। और यह तो कोई सोच ही नहीं सकता था कि वह गुफा अंदर से पूरी तरह हाईटेक होगी। हर तरफ दीवार से लगी मशीनें दिखाई दे रही थीं और उन मशीनों पर काम करते लोग भी मौजूद थे।
उन्हीं में से एक ने सर पर चढ़ा हेडफोन उतारा और दरवाजे की तरफ बढ़ा। दरवाजे पर पहुंचकर उसने वहां लगा एक बटन दबाया।
"आ जाओ।" अंदर से आवाज आयी। वह अंदर दाखिल हुआ। ये कमरा काफी आलीशान तरीके से सजा हुआ था। कमरे के बीचोंबीच पड़े बेड पर एक अधेड़ शख्स लेटा हुआ था। जिसकी लम्बी दाढ़ी सीने तक फैली हुई थी।
"क्या खबर है?" बेड पर लेटे व्यक्ति ने पूछा।
"खान, `ईट-एन-ज्वाय´ कंपनी में मौजूद हमारे नुमाइंदे खालिद ने रिपोर्ट दी है कि उनका प्रोजेक्ट सेकंड फेस में पहुंच गया है।" आने वाले ने खबर दी। उसकी बात सुनकर खान का चेहरा सिकुड़ गया।
"प्रोजेक्ट का यह फेस हमारे लिए बहुत अहमियत रखता है। खालिद को मैसेज भेजो कि अब उसे बहुत सोच समझकर कदम उठाना होगा।"
आने वाले ने सर हिलाया और वापस मुड़ गया।

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इं.विशाल के सामने फाइलों का ढेर लगा हुआ था। इन फाइलों में उन व्यक्तियों की पोस्टमार्टम रिपोर्टस थीं जो गंदी बस्ती में मचे बवाल के बीच मारे गये थे। इं.विशाल के साथ उसका असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर राघव भी उन फाइलों का अध्ययन कर रहा था।
"सर, हम लोग बेकार में सर खपा रहे हैं। इन फाइलों में कुछ भी नहीं है।" सब इंस्पेक्टर ने सारी फाइलें बन्द करके एक तरफ रख दीं और कुर्सी से पैर टिकाकर दो चार गहरी सांसें लीं।
"शायद तुमने फाइलों के अंतिम पेज पर गौर नहीं किया। जहाँ इन सबकी केमिकल रिपोर्ट दी गयी है।" इं.विशाल ने इित्मनान से कहा।
सब इंस्पेक्टर जल्दी से सीधा हो गया और एक फाइल के पन्ने पलटने लगा।
"यहाँ भी कुछ खास नहीं है।"
"ऐसे नहीं। अगर तुम बहुत सी फाइलों की रिपोर्ट एक साथ देखो तो मामला कुछ बनता दिखाई देता है। इन सबकी केमिकल रिपोर्ट यह बताती है कि सभी में कुछ ऐसे कामन उत्प्रेरक पाये गये हैं जो मस्तिष्क के एमिगडला का आकार तेजी से बढ़ाते हैं और साथ ही हाइपोथैलमस ग्रिन्थ की सक्रियता उच्च कर देते हैं।"
"मैं समझा नहीं। ये एमिगडला क्या बला है?" सब इंस्पेक्टर चकरा कर बोला।
"एमिगडला मस्तिष्क का वह भाग होता है जो मनुष्य की भावनाओं को नियिन्त्रत करता है। इनमें क्रोध, प्यार, गम, खुशी सभी शामिल हैं। यदि इसका साइज किसी खास दिशा में ज्यादा बढ़ जाये तो मनुष्य में कोई एक भावना अत्यिधक प्रबल हो जायेगी।
इसी तरह हाइपोथैलमस ग्रिन्थ मनुष्य की क्रियाओं को नियिन्त्रत करती है। तथा स्वयं एमिगडला द्वारा नियिन्त्रत होती है।
मैंने बस्तीवासियों की रिपोर्ट में पाया है कि सभी में दोनों ग्रिन्थयों की सक्रियता अत्यिधक थी। विशेष रूप से एमिगडला का साइज क्रोध की खतरनाक सीमा को पार कर गया था।"
"लेकिन ऐसा हुआ क्यो?"
"ऐसा हुआ है कुछ केमिकल्स के रिएक्शन से, जो उनके भोजन या किसी अन्य तरीके से उनके मस्तिष्क में पहुँचे।"

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"फिर तो तुम्हें ऐसी चीजों की जाँच करानी चाहिए जिनका सभी बस्तीवासियों ने एक साथ इस्तेमाल किया हो।" कमिश्नर ने इंस्पेक्टर विशाल की रिपोर्ट सुनने के बाद कहा।
"सब की नहीं। केवल आटे की।"
"क्यों?"
"इसलिए क्योकि तफ्तीश से पता चला है कि फसाद होने से ठीक तीन दिन पहले एक मल्टीनेशनल कंपनी `ईट-एन-ज्वाय´ ने इन्हें फ्री में आटे के पैकेट बांटे थे।"
 

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'ईट-एन-ज्वाय' कंपनी की भारतीय ब्रांच अशोक नायर के कण्ट्रोल में सफलता का ग्राफ काफी ऊंचा दिखा रही थी। और इसके लिए कंपनी उसे अनेकों सर्टिफिकेट्स से नवाज़ चुकी थी।
इस समय वही अशोक नायर इं.विशाल के साथ देश के सबसे बड़े आटा प्लांट के अंदर मौजूद था।
"बस्ती को आटे की सप्लाई इसी प्लांट से हुई थी। आप चेक कर सकते हैं, यहां आपको कोई गड़बड़ नहीं दिखेगी।"
"हमारी लैब की केमिकल रिपोर्ट से साफ जाहिर है कि बस्ती में बांटे गये आटे के पैकेट्स में उस खतरनाक केमिकल की मिलावट थी। अगर वह आटा इसी प्लांट से गया था तो मुझे इसे सील करना पड़ेगा।"
"हो सकता है कंपनी की दुश्मनी में किसी बाहरी व्यक्ति ने वह केमिकल मिला दिया हो।" पास में खड़ा हुआ एक युवक बोल उठा। इं.विशाल ने उसकी तरफ देखा। गोरा चिट्टा वह व्यक्ति विदेशी मालूम हो रहा था।
"आपकी तारीफ?"
नायर जल्दी से बोल उठा,"ये मि.खालिद हैं। यह प्लांट इन्ही की देख रेख में चलता है।"
"मुझे आप ही की जरूरत है। मेरे साथ चलिए। मैं इस प्लांट का निरीक्षण करना चाहता हूं।"
"आईए!" खालिद ने जवाब दिया।
दोनों ने एक तरफ से चलना आरम्भ किया। काफी बड़ा प्लांट था यह। जिसमें हर तरफ लगी विशाल मशीनें अपना काम कर रही थीं।
"`ईट-एन-ज्वाय´ का चेयरमैन कौन है?" अचानक इं.विशाल ने पूछा।
"मि.ब्लू जीन।"
"ये कैसा नाम। ये असली नाम तो नहीं हो सकता।"
"ये नकली ही नाम है। न तो उनका कोई असली नाम जानता है और न ही आज तक उन्हें किसी ने देखा है।"
"फिर कंपनी का काम काज कैसे चलता है?"
"हर साल उनकी तरफ से एक पत्र कंपनी के सी.ई.ओ. को मिलता है। जिसमें कंपनी चलाने के लिए जरूरी दिशा निर्देश व टार्गेट होता है। बाकी पूरे साल उन्हें कोई मतलब नहीं होता।"
"अजीब बात है।"
खालिद ने देखा इं.विशाल एक मशीन को गौर से देख रहा है जो गेहूं को पीसकर आटे में परिवर्तित कर रही थी।
"यहाँ गेहूं के दाने तो कुछ ज्यादा ही बड़े नजर आ रहे हैं। ये पैदा कहाँ होते हैं?"
"अफगानिस्तान के एक विशेष भाग में। जहाँ इनकी खेती बायोटेक तरीके से होती है। गेहूं के ये दाने बड़े भी होते हैं और इनसे आटा भी बहुत ज्यादा निकलता है। एक किलो आटे को बनाने के लिए केवल दस दाने काफी होते हैं।"
"बहुत खूब।"
"इसीलिए हमारी कंपनी दुनिया की रोटी की डिमांड का तीस प्रतिशत अकेले सप्लाई कर रही है। आप खुद देख सकते हैं।" खालिद आगे बढ़ा और वहां रखे एक कटोरे में गेहूं भरकर इं.विशाल के सामने लाया। इं.विशाल उन्हें हाथों से टटोलने लगा।
"इनका वजन भी अच्छा खासा है।"
एकाएक उसका हाथ किसी सख्त चीज से टकराया। उसने निकालकर देखा। ये एक छोटा सा बैज था। खालिद की भी नजर उसपर पड़ी।
"ये तो नायर साहब का बैज है। जिसे कल से वो काफी परेशान होकर ढ़ूंढ रहे हैं। लाईये, मैं उन्हें दे दूंगा।"
इं.विशाल ने बैज खालिद की तरफ बढ़ाया। उसी समय बैज पर उंगलियों का दबाव पड़ने से एक खटका सा हुआ और वह दो भागों में खुल गया।
"इसके अंदर क्या है?" दोनों ने देखा, अंदर एक छोटा सा प्लास्टिक कार्ड रखा हुआ था।
"शायद यह मि.नायर का इलेक्ट्रानिक आईडेन्टटी कार्ड है, जो उन्हें कंपनी की तरफ से दिया गया है।" इंस्पेक्टर ने अनुमान लगाया।
"हमारी कंपनी का कार्ड हरे रंग का होता है। जबकि यह लाल है।"
"फिर तो इस बारे में मि.नायर ही बता पायेंगे।" इंस्पेक्टर गौर से कार्ड को देखने लगा।

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"इस बैज के बारे में आप काफी परेशान थे मि.नायर।" इं.विशाल ने बैज अशोक नायर के सामने लहराया और नायर चौंक कर उसे देखने लगा।
"य...ये आपको कहाँ कैसे मिला?" नायर ने उसे लेने के लिए जल्दी से हाथ बढ़ाया। इं.विशाल ने बैज उसे दे दिया। नायर ने उसे लेकर जेब में डाल लिया।
"उसे चेक तो कर लें नायर साहब। उसके अंदर लाल कार्ड मौजूद है भी या नहीं।"
"क्या मतलब?" इस बार नायर के स्वर में परेशानी भी झलकने लगी थी।
"मतलब ये कि लाल कार्ड बैज के अंदर नहीं है। दरअसल उसे हमारे कम्प्यूटर ने पूरी तरह पढ़ लिया है। उसके अनुसार बस्ती में हुए नरसंहार का जिम्मेदार तुम्हें मय सुबूत ठहराया जा सकता है।"
नायर का पूरा चेहरा पसीने से भीग चुका था।

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इं.विशाल कमिश्नर के सामने अपनी रिपोर्ट दे रहा था।
"ईट-एन-ज्वाय कंपनी में कार्यरत नायर असलियत में `वैप´ कंपनी के लिए कार्य कर रहा था। जो दुनिया की सबसे बड़ी हथियारों की सौदागर है। और परोक्ष रूप में यह देशों में ऐसा माहौल पैदा करती है कि वहां दंगे फसाद हों और हथियारों की बिक्री अधिक से अधिक हो। इसी कंपनी ने क्रोध भड़काने वाले केमिकल का आविष्कार किया और उसके टेस्ट के लिए हमारे शहर की गंदी बस्ती को चुना गया। इसके लिए कंपनी ने उन बिल्डर्स से भी पैसा लिया जो उस बस्ती को खाली कर वहाँ मल्टी काम्प्लेक्स बनाने का प्लान कर रहे हैं।
योजनाबद्ध ढंग से नायर ने इस काम को अंजाम दिया। अगर मेरे हाथ में इत्तेफाक से उसका लाल कार्ड न आता तो हम ईट-एन-ज्वाय को ही दोषी समझते और उसे देश से बाहर जाने का फरमान सुना दिया जाता। अब यह सरकार को तय करना होगा कि `वैप´ से आगे कोई सम्पर्क रखा जाये या नहीं।"
"हुम्म!" कमिश्नर ने सर हिलाया। उसी समय विशाल के मोबाइल की घंटी बजी। उसने फोन रिसीव किया, दूसरी तरफ खालिद था, "इंस्पेक्टर साहब, ईट-एन-ज्वाय के चेयरमैन मि.ब्लू जीन आपसे और कमिश्नर साहब से मुलाकात चाहते हैं।"
इं.विशाल ने कमिश्नर साहब की तरफ देखा।
"ओ.के., हम तैयार हैं।" कमिश्नर की सहमति देखते हुए इं.विशाल ने जवाब दिया।
"ठीक है, कल सुबह आठ बजे कंपनी का विशेष विमान आपको चेयरमैन महोदय तक पहुंचा देगा।"

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जब कंपनी का विमान रनवे पर उतरा तो कमिश्नर और इं.विशाल को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि यह अफगानिस्तान का बीहड़ व पहाड़ी इलाका था। वे बाहर उतरे तो कुछ सिक्योरिटी गाडोZं ने उन्हें अपने घेरे में ले लिया।
थोड़ी देर बाद वे ऐसी गुफा में थे जो अत्याधुनिक थी। और फिर वे उसके एक बहुत ही सजे हुए कमरे में पहुंचा दिये गये जहां एक बलिष्ठ शरीर का बूढ़ा सोफे पर बैठा हुआ था। उसकी लम्बी दाढ़ी सीने पर झूल रही थी।
"आप...!" कमिश्नर ने कुछ कहना चाहा।
"मैं ही हूं ईट-एन-ज्वाय का चेयरमैन - ब्लू जीन।"
"मैं नहीं मानता।" इं.विशाल बोल उठा, "अगर मेरी नजरें धोखा नहीं खा रही हैं तो तुम सिर्फ एक आतंकवादी तबारक खान हो, जिसकी तलाश पूरी दुनिया को है।"
"यह गलत है!" बूढ़े की तेज़ आवाज कमरे में गूंज उठी, "हां, मेरा असली नाम तबारक खान है। लेकिन मैं आतंकवादी नहीं हूं। असलियत क्या है, मेरे मुंह से सुनो।
आज से चालीस साल पहले जब आधी दुनिया में अनाज की कमी के कारण भुखमरी फैल गयी थी तो मैंने एक कंपनी 'टेक-फूड' की बुनियाद डाली थी जिसने बायोटेकनीक रिसर्च का इस्तेमाल करते हुए अनाज का इतना उत्पादन किया कि कंपनी पूरी दुनिया का पेट भरने में सक्षम हो गयी।
कुछ महान देशों को यह नागवार गुजरा, क्योकि उनका मकसद था कि आधी दुनिया उनसे भीख मांगती रहे। उन्होंने मेरी कंपनी के एक प्रमुख अिधकारी को साथ मिला लिया और उसके जरिये मेरे गोदामों को जहरीला कर दिया। नतीजे में पेट भरने वाला अनाज लोगों की मौत बनने लगा। विश्व स्तर पर जाँच हुई और मेरी कंपनी को दोषी मानते हुए मुझे आतंकवादी करार दे दिया गया। दुनिया की नजरों से बचने के लिए मुझे इन गुफाओं में पनाह लेनी पड़ी।"
"उस अधिकारी का क्या हुआ?" विशाल ने पूछा।
"आज वह `वैप´ कंपनी का चेयरमैन बनकर हथियारों की दलाली कर रहा है।"
"फिर तो उसने दूसरी बार आपको चोट पहुंचाने की कोशिश की।"
"मुझे नहीं बल्कि मानवता को, वह भी अपने नीच स्वार्थों के लिए। क्योंकि उसे खुद भी नहीं पता कि ईट-एन-ज्वाय का चेयरमैन भी मैं ही हूं। ईट-एन-ज्वाय को स्थापित करने में मैंने पूरी सावधानी से काम लिया। नकली नाम से उसका चेयरमैन बना। बहरहाल मुझे मानवता के लिए काम करना था। यहां भी मुझसे थोड़ी सी चूक हो गयी और `वैप´ के वैम्पायर ने नायर के जरिये अपना खेल दिखा दिया। जब मुझे साजिश का पता चला तो मैंने अपने भरोसेमंद साथी खालिद को वहां भेजा। मुझे वैप को बेनकाब भी करना था। खालिद ने इस काम को पूरी कामयाबी के साथ अंजाम दिया। उसने नायर के बैज की असलियत पता कर उसे  चतुराई के साथ तुम्हारे हाथों में पहुचा दिया। जिसकी जाँच कर तुम असली मुजरिम तक पहुंच गये।" बूढ़ा तबारक खान खामोश हो गया।
थोड़ी देर की खामोशी के बाद कमिश्नर बोला, "मैं सोच भी नहीं सकता था। तबारक खान, मैं पूरी कोशिश करूंगा तुम्हें दुनिया के सामने लाने की। एक मसीहा के माथे से आतंकवाद का कलंक मिटाकर।"

-- जीशान हैदर ज़ैदी



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by Dr. Radut.