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मिठास

“काग्रेचुलेशन्स, मधु” वीणा ने खिलते हए गुलाब की तरह कहा।
“काहे का कांग्रेचुलेशन दे रही है?" ऋमधु ने स्नेहसिक्त स्वर में कहा।
“ अरे लो इस बार फिर दिल्ली विश्वविद्यालय ने तुझे युवा उत्सव की संगीत प्रतियोगिता के लिए चुन लिया है और तू कह रही है कि काहे का काग्रैचुलेशन।"
“अरे इस साल फिर वही होगा, ये शक्कर खोरे, जो गहराई में नहीं जा सकते फिर किसी मीठे गले में स्वर्ण – पदक की माला डाल देंगे।”
“नहीं नहीं अब की बार ऐसा नहीं होगा क्योकि इस बार रविशंकर भी आ रहे हैं।”

दिल्ली की दिसम्बर की धूप का मजा कुछ और ही है, वह जैसे बडे प्यार से सहलाती है। भारत के लगभग सभी विश्वविद्यालयों से बडी संख्या में प्रतिनिधि आये थे और तालकटोरा गार्डन में, इस समय की चहल – पहल कुछ ज्यादा ही रंगीन थी। जहां – तहां लड़के – लड़कियों के झुंड खड़े होकर बतियाते और हंसते मिल जाते थे।

शास्त्रीय संगीत में पिछले वर्ष की भांति लग रहा था कि, इस वर्ष भी स्वर्णपदक के लिए, मुकाबला उन्हीं दो लड़कियों में था। स्वाति, जो बम्बई से आई थी, की गला बहुत ही मधुर था और उसके गायन में हीराबाई बडो़देकर का प्रभाव स्पष्ट दिख जाता था। जबकि दूसरी लड़की मधु दिल्ली विश्वविद्यालय से ही थी और उसकी – गायन शैली में गंगूबाई हंगल का हल्का सा प्रभाव था।और अचरज की बात यह कि उसकी आवाज भी कुछ वैसी ही कम मधुर थी।

पिछले वर्ष की प्रतियोगिता में जब मधु ने अपना गायन समाप्त किया था तो हाल में सभी तरफ से तालियां गूंज उठी थीं और चूंकि उसने स्वाति के बाद गाया था, इसलिए उसे लगा था कि प्रथम पुरस्कार उसे ही मिलेगा। किन्तु, जब जजों ने अपना फैसला दिया, तो स्वाति को स्वर्ण पदक मिला था और यद्यपि मधु  को रजत तो मिला था किन्तु पदक लेते समय उसकी आँखों में आँसू आ गए थे क्योकि वह अच्छी तरह स्वयं जानती थी कि वह स्वाति से कहीं बहुत अच्छा गाती है। अधिकांश श्रोताओं की भी राय यही थी किन्तु ऐसा कहने के बाद कुछ लोग कह देते थे कि भाई स्वाति की आवाज में जो मिठास है, वह संगीत के आनन्द को दुगुना कर देती है। तब मधु सोचती कि ये लोग रसज्ञ नहीं हैं, मिठाई के नाम पर चीनी में लपटी मिठाई के स्थान पर परिमार्जित स्वाद वाला ‘संदेश’ इन्हें पसंद नहीं आयेगा । ये लोग संगीत की बारीकियां नहीं जानते। और वह यह मानने को तैयार नहीं थी कि मात्र सुरीली आवाज के कारण स्वाति को उससे ऊँचा दर्जा दिया जाए। उसे अफसोस था कि जज लोग भी सुरीली आवाज को कलात्मक गायन की अपेक्षा अधिक वजन देते है और वह मन ही मन ऐसे लोगों पर क्रोध करती थी और सोचती थी कभी कोई अच्छे जज मिलेंगे और रसिक श्रोता मिलेंगे, तब उसके गायन की ताकत और प्रभावशीलता को पहचानेंगे।

पिछले वर्ष की संगीत प्रतियोगिता में उसके चाचा जो बैल रिसर्च लेबोरेट़ीज में इलेक्ट़ॉनिकी विषयों पर अनुसंधान कर रहे हैं, आये थे। और उन्हें भी संगीत का बहुत शौक है इसलिए वे भी उस कार्यक्रम में गायन सुनने गए थे। कार में लौटते समय जब मधु अप्ना रोना न रोक पाई तब उन्होनें प्यार से समझाते हए कहा था, “राग मालकौश में तुमने जो मीडें लगाई थीं और गमक का जो सुन्दर उपयोग किया था, उसकी तुलना में स्वाति का गायन तो बडा सीधा और सपाट था। इसमें कोई संदेह नहीं की तुम्हारा गाना स्वाति के गाने से कहीं अच्छा था, इसलिए रोने की कोई बात नहीं , सब रसज्ञ लोग मानते है तुम उससे कहीं अच्छा गा लेती हो।”

तब मधु ने कहा, “रोना तो इसी बात का हैं, वरना यदि मैं उससे अच्छा न गाती तो मुझे उसके स्वर्ण पदक का कोई दुख न होता।”

चाचा ने कहा, “ ये जो जज आये थे ये मुझे परिपक्व नहीं लगते हैं और जैसे तुम बडी होगी और बाहर जाओगी, तब तुम्हें रसज्ञ लोग भी सुनेंगे। इसलिए इस छोटी सी बात को भूल जाओ और मन लगाकर अभ्यास करती रहो। अभी तुम्हें अगले वर्ष इसी प्रतियोगिता  में भाग लेना है और मेरा दावा है कि तुम उसमें जरूर स्वर्णपदक जीतोगी।” मधु ने हालाकिं समझ लिया था कि चाचाजी उसका मन बहलाने के लिए इस तरह की बातें कर रहे हैं,  लेकिन फिर भी जानें क्यों जिस आत्मविश्वास के साथ चाचाजी ने यह बात कही थी, उसे उन पर भरोसा हुआ और उसका दुख भी हल्का होने लगा।

उसके चाचा ने इस बार फिर युवा समारोह के समय अमेरिका से आने का कार्यक्रम बनाया था और आ भी गए थे। और उन्होंने इस बार पूर्ण विश्वास से बतलाया कि मधु को ही स्वर्ण पदक मिलेगा, विशेषकर इसलिए कि रविशंकर जैसे चोटी के संगीतकार उसकी अध्यक्षता कर रहे हैं। वे अमेरिका से एक प्र``सिद्ध होम्योपैथिक दवाई लाये थे जिसका दावा था  कि उसके खाने से गले में मधुरता बढ़ जायेगी। हालांकि होम्योपैथिक दवाई गहराई से लम्बे समय तक काम करती है किन्तु यह दवा उसका अपवाद थी क्योकि इस दवा का प्रभाव मात्र एक घंटे तक ही रहता है। इसलिए उन्होनें मधु से बतलाया कि कार्यक्रम शुरू होने के 10 – 15 मिनट पहले उसको यह दवाई खानी चाहिए। तब मधु ने पूछा कि यदि वे अधिक खुराक ले आते तो वह उस दवा को आजमा लेती। चाचाजी ने उसे बतलाया कि एक तो अमेरिका में होम्योपैथिक डाक्टर एलोपैथिक डाक्टरों से कहीं अधिक मँहगे है और दूसरे यह दवा तो बहुत ही ज्यादा मँहगी है। और चूँकि उन्हें अपने डाक्टर पर बहुत भरोसा है इसलिए वे एक ही खुराक लाये हैं और मधु को पूरे आत्मविश्वास के साथ यह दवाई खानी चाहिए क्योकि यह दवाई अपना काम जरूर करेगी।

एक दिन चाचाजी ने मधु से कहा कि वह अपने संगीत आयोजकों से यह पूछ ले कि क्या वे कार्यक्रम के समय मधु का गायन अपने कैसेट रिकार्डर मे रिकार्ड कर सकते हैं। पहले तो आयोजकों ने ना कर दी किन्तु जब चाचाजी उनसे मिलने गए और उन्हे समझाया कि उनका ध्येय रिकार्डिग करके उसे अमेरिका  ले जाना है तब वे मान गए । मधु का बडा भाई विकास भी संगीत सुनने का शौक रखता है और वह भी बहन का उत्साह हमेशा बढाता रहता था। जिस दिन संगीत प्रतियोगिता  हो रही थी, उसी दिन चाचाजी विकास को लेकर बहुत पहले से ही ऑडिटोरियम पहुंच गए थे। और वहां के ध्वनि – विस्तारक यंत्र के बारे मे जानकारी प्राप्त कर रहे थे। उन्होने देखा कि अनुमति मिलने  के बावजूद इन कार्यकर्ताओं को यह बात पसन्द नहीं आ रही थी की वे अपना रिकार्डर उनके एम्पलीफायर में लगाएं।
अब चाचाजी कुछ घबडाए से नजर आए। वे विकास को एक कोने में ले गए और कहा कि यदि वे रिकार्डर नहीं लगा पाएंगे तो सब गुड़ गोबर हो जाएगा। विकास की समझ में यह बात नहीं आई । उसने कहा “अरे चाचाजी आप घर में रिकार्डिग कर लेना,  मैं अपने एक मित्र से बढ़िया माइक्रोफोन ले आऊगां और रिकार्डर तो आपका  ही दिया हुआ अल्ट़ामाडर्न है।”

“रिकार्डिंग की बात तो मात्र एक बहाना है, मैने एक बिल्कुल नए किस्म का एम्पलीफायर बनाया है। यह आविष्कार विश्व में अभी तक कहीं नहीं हुआ है। यह एम्पलीफायर मधु की आवाज को मीठा भी कर देगा और उसमें ताकत भी ले आयेगा और उसकी आवाज की जो चारित्रिक विशेषता है उसे भी बनाये रखेगा। चाचाजी ने इधर–उधर नजर डालते हुए धीरे से फुसफुसाया।”

“ये कैसे हो सकता है? विकास अपने आश्चर्य और विश्वास को नियंत्रण में नहीं रख पा रहा था। तब क्या वह होमियोपैथी की गोली भी मधु बहलाने के लिए है।”

“यह तुम खुद ही समझ सकते हो, अभी तुम यह बतलाओ कि इन मिस्त्रियों को कैसे मनाएं¸” चाचाजी फिर धीरे से बोले।

“आप के पास कैसेट कितने हैं? क्या दो कैसेट ज्यादा हैं?" विकास ने पूछा।

“यह तो मैने सोचा ही नहीं था। मै देखता हूँ। वे अपना बैग खोजते हुए  बोले, “वैसे तो मै अमेरिका  से 6 कैसेट लाया था पर …अरे देखो ये रहे तीन कैसेट, मेरा तो दिखावे का काम एक ही कैसेट से चल जाएगा।” वे दोनों फिर मिस्त्री के पास गए ।

विकास ने पूछा “तुम्हारे एम्प्लफायर का आउटपुट कितना है?" उस आदमी ने जिसका नाम रामलाल था, बड़े ही अभिमान के साथ कहा, “यह तो 1500 वाट का एम्पलीफायर  है” ।

चाचाजी, “अरे इतना बड़ा एम्पलीफायर 5000 वाट तक का आउटपुट देता है।”

तब रामलाल की उत्सुकता जागी, “अच्छा क्या आप अमेरिका में रहते है। तब विकास ने उसे बताया कि वे अमेरिका में इसी ध्वनि के विषय पर अनुसंधान करते हैं और इस विषय में विश्व – प्रसिद्ध हैं।

चाचाजी ने फिर पूछा कि उनके एम्पलीफायर का फ्रीक्वेंसी रिस्पोस कैसा है। जब रामलाल ने कहा कि वह ‘फ्रीक्वेंसी रिस्पौंस’ नहीं जानता पर उसका एम्पलीफायर ‘हाई – फाई‘ है। तब विकास ने कहा कि ‘हाई फाई‘ तो अब  पिछडी टैक्नौलाजी है जिसमें ‘फ्रीक्वेंसी  रिस्पोस’ आज की टैक्नौलाजी के मुकाबले बहुत कमजोर होता है। विकास ने रामलाल से पूछा, “यदि आप चाहे तो मै चाचाजी से कहूं कि वे आपको समझाएं कि ‘फ्रीक्वेंसी रिस्पौंस’, जिसे हिन्दी में  ‘आवृत्ति अनुक्रम’ कहते है, क्या  होता है। किसी भी अच्छे इंजीनियर को आवृत्ति अनुक्रम का समझना जरूरी है।” रामलाल ने देखा कि अभी क्रायक्रम शुरू होने में काफी समय है, इसलिए उसने यह बात मान ली।

तब चाचाजी ने उसे समझाना शुरू किया, “हम जब बोलते या गातें हैं तब आवाज हवा में तरंगो के रूप में तैरती हुई जाती है। यह ध्वनि – तरंग कोई एक तरंग न होकर बहुत से तरंगो का मिश्रण होती है। वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि मानव – ध्वनि हवा में एक प्रकार की तरंग है। ये तरंगे कोई 20 चक्र प्रति सैकिण्ड से लेकर 20 हजार चक्र प्रति सैकिण्ड तक की तरंगो का मिश्रण होती हैं। वैसे आजकल इस ‘चक्र प्रति सैकिण्ड’ को हर्टज़ का नाम दिया गया है। आवाज में जो गुण हैं जैसे आवाज का मोटा होना या पतला होना या भारी होना या मधुर होना, ये सब उस आवाज में निहित तरंगो की आवृति की विविधता और सामंजस्य पर निर्भर करते है। जिस आवाज में निचली आवृति की ध्वनि ज्यादा होगी जैसे 200 से लेकर 1000 हर्टज तक तब उसकी आवाज बहुत भारी होगी जैसे रफी की। और जिसकी आवाज में ऊंची आवृति जैसे 1 – 2 हजार हर्ट़ज से ऊपर की आवृति अधिक होंगी, उसकी आवाज पतली कहलायेगी जैसे लता मंगेशकर की आवाज और आम तौर पर लोग पतली आवाज को मीठा कहते है। किन्तु यदि किसी की आवाज भारी है अथार्त उसमें नीचे की आवृतियों की ताकत ज्यादा है किन्तु साथ ही साथ उसमें ऊंची आवृति भी अच्छी मात्रा में हैं तब उसकी आवाज भारी और मीठी और समृद्ध कहलाएगी, जैसे कि मुहम्मद रफी की आवाज । मतलब यह कि ध्वनि के अन्दर विभिन्न तरंगों के आपसी संबंध में ही उस ध्वनि का गुण या उसकी विशेषता निहित है। इस दुनियां में करोंडों आदमी रहते हैं और सबकी आवाज़ अलग हैं, जैसे आँखे भी और बाल भी। उसकी आँख या उसके बालों की तरह वह उसका ‘ध्वनि – चारित्रिक’ कहलाया जा सकता है। हमारे कान इतने सूक्ष्म रूप से संवेदनशील हैं कि वे ध्वनि तरंगो के सूक्ष्म अन्तर को भी पकड़ लेते है।

विकास ने पूछा, “यदि इन विभिन्न तरंगो के आपसी संबंध बिगाड़ दिए जाएं तो वह क्या वह आवाज फिर पुरानी आवाज नही रह जायेगी ?”

“हां, बल्कि वह बदल जाएगी” चाचाजी ने जारी रखते हुए कहा, “ चूँकि एम्प्लफायर एम्प्लीफाई करता है, अथार्त प्रवर्धन करता है, तब उसके द्वारा दिये गए आवृत्ति और प्रवर्धन के संबंध को आवृति – अनुक्रिया कहते हैं।”

विकास, “अच्छा जब किसी एम्प्लीफायर या प्रवर्धक की आवृत्ति अनुक्रिया समतल होती है तभी वह प्रवर्धन के लिये मिली विद्युत तरंगों की शक्ति तो बढ़ा देती है किन्तु उन तरंगों की आवृत्तियों के आपसी संबन्धों को बिगाड़ती नहीं है।इसीलिये ऐसे प्रवर्धक को ‘हाई फाइडिलिटी एम्प्लीफायर’ कहते हैं।” यह सुनकर रामलाल के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई।

चाचाजी ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, “और जो एम्पलीफायर तरंगो की जितनी अधिक आवृतियों का जितना अधिक प्र`र्वधन समान अथार्त बिना भेद भाव के  कर सकता है उसकी आवृति – अनुक्रिया उतनी ही अच्छी होती है।"

तब रामलाल ने अपने एम्पलीफायर की किताब निकाल कर चाचाजी के हाथ में पकड़ा दी और कहा कि वे देख कर बतलाएं । चाचाजी ने देखकर मुस्कुराते हुए बताया कि उसके एम्पलीफायर का रिस्पौंस तो 80 हर्ट़ज से लेकर 14 हजार हर्ट़ज तक ही है, जो कि उसे हाई फाई कहलाने का हक बराबर देता है। और अब तो अमेरिका में ऐसे एम्पलीफायर बनते हैं कि जो  5 हर्टज से लेकर 40 हजार हर्ट़ज तक की ध्वनि आवृत्तियों का एकदम समान रूप से अच्छी मात्रा में प्रवर्धन करते हैं।

तब रामलाल ने पूछा, “जब आदमी की ध्वनि 20 से लेकर 20 हजार चक्र प्रति सैकिण्ड तक ही है, तब ऐसे एम्पलीफायर, जो 40 हजार हट़र्ज तक काम करते हैं, बनाने का क्या फायदा ?” तब चाचाजी ने उसे समझाया कि जब गायन में ऊँची और नीची आवृतियों में चढ़ाव  – उतार तेजी से हो, उस समय ये अधिक आवृति फैलाव वाले तथा अधिक आउटपुट वाले एम्पलीफायर ज्यादा अच्छा काम करते है।

विकास ने रामलाल से पूछा कि क्या उसके पास कैसेट प्लेयर है और कौन सा कैसेट है और वह कौन से कैसेट का इस्तेमाल करता है?तब उसने बताया कि वह तो जो कैसेट मिल जाता है, उसी का इस्तेमाल कर लेता है। तब उन्होनें (चाचा जी ने) बताया कि साधारण कैसेट रिकार्डर और कैसेट दोनों की आवृति अनुक्रिया तो सबसे कमजोर  होती हैं और आमतौर पर जो कैसेट मिलते हैं, वे तो मात्र 200 चक्र प्रति सैकिण्ड से लेकर मात्र 10 या 12 हजार प्रति सैकेण्ड तक की आवृत्तिया ही समान रूप से रिकार्ड कर सकते हैं। इसलिए उनमें जो ध्वनि सुनाई देती हैं, वह सच्ची नहीं हैं या डिस्टाटेर्ड है। और तब उन्होने रामलाल को अपनी जेब से ‘मेक्सैल’ के दो कैसेट निकालते हुए दिए और बताया कि इनकी आवृति अनुक्रिया 40 चक्र प्र`ति सैकेण्ड से लेकर 16 हजार चक्र प्रति सैकेण्ड तक के लिए एक समान है और दुनियाँ में इससे बढ़िया कैसेट भी नहीं मिलते हैं। रामलाल ने पहले तो सच ही नाहीं की पर बाद में उन्हे बहुत – बहुत धन्यवाद दिया और उनके उदार दिल की प्रशंसा भी की। अब रामलाल से पूछकर चाचाजी ने अपने कैसेट रिकार्डर को  एम्पिलफायर में लगाना शुरू किया। अब रामलाल उनके उस लगाने में सहयोग दे रहा था।

अब तो काम की शुरूआत ही हुई थी, असली काम अथार्त वह जादुई एम्पलीफायर लगाना बाकी था। अपनी कोशिश जारी रखते हुए उन्होने कहा कि उनके कैसेट रिकार्डर में जो एम्पलीफायर है, उसकी आवृति अनुक्रिया 20 चक्र प्रति सैकेण्ड से लेकर 40 हजार चक्र प्रति सैकेण्ड तक की है जो कि उसके एम्पलीफायर से कहीं अच्छा है और उसका आउटपुट इतना छोटे होते हुए भी 2000बाट है। इसलिए यदि वह चाहे तो वे अपना एम्पलीफायर उसके सर्किट में लगा देगे। उसने कहा, “पहले मै इस टेस्ट करूँगा और यदि ठीक पाऊँगा तभी यह करूँगा।” उन्होने कहा, “जरूर जरूर इसे जरूर टेस्ट कर लो।” टेस्टिंग करने पर उस मैकनिक ने देखा कि आवाज सचमुच में बहुत अच्छी आ रही है, इसलिए उसने उन्हें ऐसा करने दिया।

सबसे पहला गायन मधु का ही था। गायन शुरू होने के पन्द्रह मिनट पहले उसने वे होमियोपैथी की गोलियां सरस्वती देवी की प्रार्थना करते हुए खा ली थीं। वह थोडी सी विक्षुब्ध भी थी किन्तु गोलियां खाने पर उसे शांति मिली। मधु ने बागेश्वरी का अलाप लेना शुरू किया था। जब वह आवाज श्रोताओं तक पहुंची तो, उसकी मधुरता से सभी लोग मुग्ध हो रहे थे। स्वयं मधु को भी कुछ आश्चर्य हो रहा था कि आज उसकी आवाज में इतनी मिठास कैसे आ गई तब वह समझ गई कि हो न हो यह उन्हीं गोलियों का प्रभाव हैं, जो उसके चाचाजी ने उसे दी हैं। आज उसे अपने गाने में बहुत अधिक आनंद स्वयं भी आ रहा था।

“अरे चाचाजी यह तो स्वाति का भाई आ रहा हैं, कहीं गड़बड़ न हो जाए।” विकास ने घबडाते हुए फुसफुसाया।

“क्या ये इलेक्ट्रानिकी इंजीनियर है?” चाचाजी ने धीरे से पूछा किन्तु उसी समय रामलाल ने उस व्यक्ति को रोकते हुए कहा कि वह साउंड रूम में नहीं आ सकता।

"तब ये लोग कैसे आ गए हैं?" उसने उनकी तरफ इशारा करते हुए पूछा।

“ये साहब तो अमेरिका से आए हैं और मैनेजर साहब से बकायदा अनुमति लेकर रिकार्डिग कर रहे है, आप जाइए।” रामलाल ने उत्तर दिया। वह चला गया तब चाचाजी की जान में जान आई।

मधु ने तन्मयता से गाया। जब उसने बागेश्वरी का गायन समाप्त किया, हाल तालियों की गड़गडाहट से गूंज गया। वह अपने गायन से बहुत ही प्रसन्न और संतुष्ठ थी। उसके गायन के बाद चार गायकों ने और भी गाया, जिनमें स्वाति भी थी। स्वाति ने राग यमन चुना था जोकि सरल है किन्तु लोकप्रिय है। स्वाति ने भी आज बहुत सुन्दर गाया किन्तु अब मधु को कोई चिन्ता नहीं हो रही थी और उसे पूरा विश्वास था कि उसे ही स्वर्ण पदक मिलेगा और अन्त में जब रविशंकर जी ने निर्णय सुनाया तो उसकी आंखो में फिर आंसू आ गए किन्तु वे खुशी के आंसू थे क्योकि स्वर्ण पदक उसे मिला था।

लौटते समय उन्होने मधु से पूछा कि उसे वे छोटी छोटी गोलियां कैसी लगीं। मधु ने जवाब दिया कि कुछ अजीब बात है क्योंकि वह गला जो अच्छा हुआ था वह गायन समाप्त होते ही जादू सा समाप्त हो गया । तब विकास ने पूछा चाचाजी ये कैसी गोली हैं और उसने नटखट स्वर में कहा, “मुझे कुछ कुछ लग रहा हैं कि हो न हो आपने जो प्रवर्धक लगाया था, यह उसी का कमाल है। क्योंकि मधु का गाना खत्म होने का बाद आपने उस एम्पलीफायर में कोई स्विच भी दबाया था। लेकिन आप यह बताइये कि यदि आपके प्रर्वधक की आवृति अनुक्रिया बहुत अच्छी है तो  वह सब आवृतियों का समान रूप से प्रवर्धन करेगी तो दीदी की जैसी कुछ मोटी सी आवाज है, वैसी ही मोटी सी आयेगी तब आपके उस प्रवर्धक से दीदी की आवाज में इतनी मिठास कैसे आ गई।

तब उन्होने समझाया, “आवाज की जो मिठास हैं, वह आवाज के अन्दर जो विभिन्न आवृतियां हैं उनके आपसी अनुपात पर निर्भर करती हैं। आमतौर पर यह माना जाता है कि जिसकी आवाज में जितनी ऊँची आवृतियां होंगी, वह उतनी ही मीठी होगी। हालांकि उँची आवृति वाली ध्वनि में मिठास तो होती हैं किन्तु ताकत कम होती है। ताकत निचली आवृतियों में होती हैं । इसलिए यदि इन विभिन्न आवृत्ति वाली ध्वनियों में ठीक से संतुलन किया जाए तो सुन्दर से सुन्दर और सशक्त से सशक्त आवाज बनाई जा सकती है। लेकिन इस संतुलन करने में जो कठिनाई है वह आवाज को बदलते हुए भी उसकी चारित्रिक विशेषता बनाए रखना है। पिछली बार जब मैं आया था तब मधु की आवाज़ रिकार्ड करके ले गया था। और उस आवाज की कमजोरियों को संतुलित करते हुए मैने एक ऐसा विशेष प्रवर्धक बनाया जो सभी आवृतियों का समान रूप से प्रवर्धन नहीं करता जैसा कि एक अच्छे प्रवर्धक को करना चाहिए। वरन मेरा प्रवर्धक उसकी आवाज की कमजोरी जानते हुए उसकी उँची आवृति का अधिक प्रवर्धन करता है तथा साथ हीं उँची और नीची आवृतियों को यथोचित संतुलित भी रखता है। मधु की आवाज को मधुर बनाते हुए भी वह मधुर आवाज म्धु की ही लगे, इस प्रयत्न  में मुझे पूरे वर्ष प्रत्येक दिन के 8 ­10 घंटे काम करना पडा  तब कहीं यह जादुई एम्पिलीफायर बन पाया और वही विशेष एम्पिलफायर मैने अपने कैसेट रिकार्डर के साथ लगाया था।

विकास ने तुरंत पूछा, “कि क्या आपके यंत्र में एक नहीं दो प्रवर्धक हैं। एक तो अच्छी आवृति अनुक्रिया वाला और दूसरा मधु की मिठास बढाने वाली आवृति अनुक्रि```या वाला?"

चाचाजी ने जवाब दिया, “भाई विकास  तुमने तो कमाल कर दिया, तुमने बिल्कुल ठीक समझा, और इसीलिए मधु के गायन के बाद मैंने स्विच दबा कर जादुई एम्पलीफायर की जगह अच्छी आवृति अनुक्रिया वाला एम्पलीफायर स्विच कर दिया था।

मधु बोली, “तो यह कैसेट रिकार्डर का कमाल था, गोली का नहीं, तो फिर मेरी आवाज फिर वैसी ही रह जायेगी?”

चाचाजी ने कहा, “अब तुम्हें चिन्ता करने की जरूरत नहीं हैं क्योंकि अब तुम्हारा नाम, थोडा ही सही, पर हो गया है और गंगूबाई हंगल की तरह तुम भी थोड़ा अभ्यास से अपनी आवाज में ताकत और वजन ले आओ तो तुम्हारे गाने को भी लोग उतने प्यार से सुनेंगे, जितना गंगूबाई हंगल को।”

और मधु को स्वयं आश्चर्य हो रहा था कि अब उसके दिल में स्वाति के प्रति कोई जलन नहीं हो रहीं थी और न ही उन निणार्यकों के प्र`ति जो मधुर आवाज को इतना महत्व देते हैं क्योंकि स्वयं उसने भी महसूस कर लिया था कि मधुर आवाज में भी एक ताकत होती है जोकि संगीत की सुन्दरता वैसी ही बढ़ाती है, जैसे कि सुन्दर रूप एक उच्च हृदय की सुन्दरता के प्रभाव को बढाता है।

-- विश्वमोहन तिवारी
पूर्व एयर वाईस मार्शल



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