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बैलों वाली कार

वह एक सामान्य शहर था...आदमियों से खचाखच भरा...बत्तीसवीं सदी का शहर। जनसंख्या नियंत्रित थी क्योंकि लोग बढ़ती जनसंख्या के बुरे असर से बुरी तरह प्रभावित हो चुके थे। अब तक जनसंख्या इतनी बढ़ चुकी थी कि पानी से बाहर बची धरती के दो तिहाई हिस्से पर इन्सान रहते थे। बची एक तिहाई भूमि का करीब आधा भाग धरती का तापक्रम बढ़ने से और मिट्टी के रासायनिक प्रदूषण से कुछ भी उपजाने लायक नहीं बचा था। खाने की चीज़ों की मारा-मारी होने लगी थी। हालांकि उन्होने शरीर को स्वस्थ बनाए रखने के लिये प्रयोगशाला में कृत्रिम तरीके से बनाई गयी विटामिन्स और पोषक तत्वों की बनी गोलियॉं ईजाद कर लीं थीं। इन 'लाइफ टैब्स' से शरीर तो स्वस्थ रहता था, भूख मिट जाती थी पर जीभ के स्वाद का इनसे कोई नाता नहीं था। वह तो सचमुच के  भोजन से ही मिलता। परंपरागत चीज़ों जैसे रोटी, चावल, दाल, सब्जी, मिर्च, मसाले वाला भोजन एक तरह की विलासिता माना जाता था जिसे काफी धनवान लोग ही खा सकते थे या कभी-कभी फिजूलखर्ची करके मध्यमवर्गीय लोग खाते। गरीब लोगों को तो इन बिना स्वाद वाली, हर जगह उपलब्ध 'लाइफ टैब्स' को ही निगलकर जिंदा रहना पड़ता।

यातायात की स्थिति तो और भी खराब थी। अब से करीब एक हजार साल पहले इक्कीसवीं-बाईसवीं सदी के लोगों में वाहनों की ऐसी होड़ बढ़ी कि एक वाहन क्रांति की ही शुरूआत हो गई। वाहनों के बाजार में एक घमासान शुरू हो गया। एक से बढ़कर एक विशेषताओं वाले दोपहिए और चौपहिए वाहन तैयार किये जाने लगे। जो वाहन जितने कम पेट्रोल या डीजल की खपत करता उसकी मांग उतनी ही ज्यादा होती। वाहन निर्माताओं में इसकी होड़ लगी थी कोई वाहन एक लीटर पेट्रोल में 120 किलोमीटर चलता तो कुछ 'स्निफ एंड रन` श्रेणी के वाहन तो एक लीटर पेट्रोल में तीन सौ किलोमीटर तक चलते। खरीदने की शर्तेंं इतनी सरल थी कि आपकी जेब में सिर्फ एक रूपया हो तो चले जाइये वाहन विक्रेता के पास, कुछ फार्म भरिये और चमचमाता वाहन लेकर लौटिए। चौपहिया वाहन के लिये आपके पास महज एक हजार रूपये होने चाहिए और फिर सहूलियत से चुकाते रहिये, छोटी-छोटी आसान किश्तों में बाकी का पैसा। फोन घुमाइये वाहन विक्रेता के लोग आपके घर पर आकर आपको वाहन दे जाएंगे। दस रूपये रोज़ की किश्तों पर कार मिल सकती थी, तीन रूपये रोज की किश्त पर मोटरसाइकिल और दो रूपये रोज की किश्त पर मोपेड। साइकिलें तो गुज़रे ज़माने की चीज हो गयीं थीं। ज्यादातर साइकिल बनाने वाली कंपनियां या तो बंद हो गईं थीं या फिर उन्होंने दोपहिया वाहनों का निर्माण शुरू कर दिया था। हर आम और खास आदमी के हाथों में वाहन देने की, वाहन निर्माताओं की योजनाएं फल-फूल रहीं थीं। क्लर्क से लेकर फेरी लगाने वाले तक, मज़दूर से लेकर भीख मांगने वाले तक हर एक के पास अपना कम से कम एक स्वचालित वाहन जरुर था। कुछ लोगों के घरों में तो प्रति व्यक्ति चार से छह चौपहिया और एक, दो पहिया वाहन तक थे। सड़कें यहां तक कि मोहल्लों की गलियों तक इन ईंंधन चालित वाहनों से पटने लगीं थीं। यातायात में लगनें वाले `जाम` हर शहर व गांव तथा बस्ती की सड़क पर सब आम हो गए थे। लोगों के पास वाहन खड़े करने तक की जगह न थी। धनवान लोगों ने तो कई तल्लों वाले गैराज बनवा लिये थे पर मध्यमवर्गीय लोगों के वाहन सड़कों पर बेतरतीब, घरों के सामने खड़े रहते या फिर बाज़ारों में मोटी रिस्सयों के सहारे दीवारों पर टंगे रहते थे। दिन या रात के किसी भी समय सड़कों पर वाहनों की संख्या इतनी अधिक होती थी कि चौराहों पर घंटों खड़े रहना पड़ता...घंटों लाग जाम में फंंसे रहते। रेडियो पर सड़कों पर के ऐसे जामों  की सूचनाएं प्रसारित की जाती ताकि लोग इधर-उधर से होकर न जाएं। फिर भी लोगों को छोटे-छोटे फासले तय करने में कभी-कभी काफी समय लग जाता। लोग रेल या बस पकड़ने जाते समय वहां तक पहुचने के समय में जाम में लगने वाले समय की संभावना को ध्यान में रखकर काफी जल्दी घर से निकलते।

ऑफिस छूटने के समय तो वाहनों से निकलने वाला धुआं अपने चरम पर होता। चौराहों पर धुएं के काले बादल मंडराते। ऐसे समय में लोगों को सांस लेने में दिक्कत होने लगती। ज्यादातर लोग सड़क पर चलते समय मास्क पहनते। फिर भी धुएं से उनकी आंंखों में जलन होती, उनका दम घुटता। हर घर में चार मे से तीन लोग खांसी या दमा का शिकार थे।

इतना होने पर भी लोगों में रोज नये-नये वाहन खरीदने की होड़ जारी थी। जिसके पास जितने वाहन होते, वह इतना ही इज्जतदार और धनी माना जाता। ये चलन सिर्फ भारत में ही नहीं दुनियां भर में था। वाहनों के क्षेत्र में हो रही इस हलचल से कुछ मुट्ठी भर लोग बड़े परेशान थे। ये थे पर्यावरण की फिक्र करने वाले और ऊर्जा के परंपरागत संसाधनों के लगातार खत्म होने की फिक्र करने वाले लोग।

पेट्रोलियम की कीमतें आसमान छू रहीं थीं पर इन आसमान छूती कीमतों का वाहनों की खरीद-फरोख्त पर कोई असर नहीं था। पेट्रोलियम की कीमत जितनी बढ़ती लोगों में दो पहिया और चार पहिया वाहन खरीदने की ललक उससे चौगुनी बढ़ती। जिनके पास चौपहिया वाहन होते वे किसी प्रकार जुगत करके चौपहिया वाहन लेने की सोचते, जिनके पास पुराना चौपहिया वाहन होता वे एक नया चौपहिया वाहन और लेने की कोशिश में रहते। पृथ्वी में पेट्रोलियम के भंडार तेजी से कम हो रहे थे। विश्व की राजनीति पेट्रोलियम के चारों ओर घूमने लगी थी। जिस देश के पास पेट्रोलियम का जितना बड़ा भंडार होता उसे उतना ही शक्तिशाली और समृद्ध माना जाता। विश्व के सारे प्रमुख संगठनों में उसका उतना ही अधिक दबदबा रहता। बिना पेट्रोलियम वाले देश एक तरह से उनके सामने हाथ फैलाते रहते...उनकी जी-हुजूरी करते...गाहे-बगाहे उनकी गलत मॉंगों के सामने सिर भी झुकाते। ये पेट्रोलियम के बड़े भंडारों वाले देश अकसर मनमानी पर उतर आते। थोड़े-थोड़े समय पर ये पेट्रोलियम और क्रूड आयल के दाम बढ़ा देते। बिना पेट्रोलियम वाले देशों के सामने और कोई चारा न होता वे इन 'पेट्रो राष्ट्रों' की ये बढ़ी हुईं कीमतों पर ये पेट्रोलियम और क्रूड आयल खरीदने को मजबूर होते। दुनिया भर के वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, तक्नीिशयन अपनी-अपनी पढ़ाई पूरी करते ही ऐसे पेट्रो राष्ट्रों की ओर भागते थे क्योंकि उन्हें मालूम था कि वर्तमान इन्ही का है..सम्पन्नता इन्हीं के पास है।
        
इस सब के बीच में ही कहीं पेट्रोलियम से जुड़े अपराध भी धीरे-धीरे अस्तित्व में आने लगे थे। ये अपराध व्यक्तिगत स्तर पर थे, प्रांतों के स्तर पर थे तो राष्ट्रीय और अंर्राष्ट्रीय स्तर पर भी थे। पेट्रोलियम से भरे ट्रक कड़ी सुरक्षा के बीच लाए जाते थे फिर भी लूट पाट की घटनाएंं हो ही जाती थी। दो देशों के युद्ध में अब सेना श़त्रु सेनाओं की रसद पर ही नही वरन् उनकी पेट्रोलियम सप्लाई पर भी हमला करती थी। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पेट्रोलियम अपराध तेजी से पनप रहे थे। विकसित और बलवान देश कमजोर 'पेट्रो राष्ट्रों' पर हमला करके उन पर अधिकार करने की कोशिश करते। तभी उस पेट्रो राष्ट्र की सहानुभूति पाने की गरज से बिना मांगे ही बिना पेट्रोलियम वाले देश उसकी मदद को जुट जाते। विश्वयुद्ध के से हालात बन जाते फिर मानवता की अस्तित्व रक्षा के नाम पर दुनिया को विश्वयुद्ध से बचाने के नाटक होते। हमलावर और सहायता करने वाले देशों के बीच समझौता होता और दोनों मिलकर उस छोटे पेट्रो देश को हथिया लेते। किसी पेट्रो राष्ट्र को इस तरह बेइमानी से...जोर जबरदस्ती के बल पर हथियाने को एक सुंदर सा नाम दिया गया था 'अधिग्रहण'। अगर कभी कोई पेट्रो राष्ट्र इस प्रकार के 'अधिग्रहण' का विरोध करता या उनके खिलाफ उठ खड़ा होता तो भयंकर लड़ाइयां होतीं...हजारों जानें जातीं...उस राष्ट्र के तेल के कुओं में आग लगा दी जाती। कभी-कभी तो वे पेट्रो राष्ट्र खिसिया कर खुद ही अपने तेल के कुओं में आग लगाकर 'राजस्थानी जौहर' का परिचय दे देते। जब कभी दो पेट्रो राष्ट्र किसी मसले पर आपस में लड़ बैठते तो कोई न कोई विकसित और बलवान राष्ट्र उनके झगड़े में जरूर कूद पड़ता जिसका अंत कभी सिर्फ विपक्षी या कभी-कभी दोनों देशों के तेल भंडारों के 'अधिग्रहण' में होता।

लोग गैर परंपरागत ईंधनों के व्यवहारिक उपयोग के लिये फिक्रमंद थे। इन पर बड़े-बड़े सेमिनार होते। विकसित देशों की सरकारें इन शोधों पर अरबों रूपए प्रतिवर्ष खर्च करतीं। वैज्ञानिकों ने सूरज की ऊर्जा से वाहन चलाने के प्रयास किए, बिजली से बैटरियांं चार्ज करके विद्युत कारें और विद्युत बाइक चलाने के प्रयास किये गए। कुछ वैज्ञानिकों ने पानी को पेट्रोल और डीज़ल के स्थान पर वाहनों में प्रयोग करके देखा तो कहीं कुछ वनस्पतिक तेलों को वाहनों में ईंधन की तरह प्रयोग किया गया। कुछ प्रयोगशालाओं में ये लोग गोबर गैस आदि को वाहनों में ईंधन की तरह प्रयोग करने की संभावनाएंं तलाश रहे थे। पर इन सारे प्रयोगों मे से किसी में भी कोई ऐसी गुंजाइश नहीं दिखी थी कि ये भविष्य में व्यवहारिक रूप से पेट्रोलियम ईंंधन का स्थान ले सकेगा। एक बार गोबर गैस के प्रयोग से इसमें उम्मीद की एक किरण जागी थी पर अब वह भी व्यवहारिक नहीं रह गई थी। जानवर उन दिनों केवल लाइफ टैब्स पर ही पाले जाते थे जिनसे इतना गोबर ही नहीं मिलता था जिसे पेट्रोलियम के विकल्प के रूप में देखा जा सके।

एक दिन वही हुआ जिसका अंदेशा बरसों से सबको था। पेट्रोलियम के भंडार समाप्त हो गए। वाहनों की बढ़ती भीड़ ने धरती का सारा पेट्रोलियम चूस लिया था। वैज्ञानिक बिरादरी पहले ही पेट्रोलियम की खोज में धरती का चप्पा-चप्पा तलाश चुकी थी...समुद्रों का इंच-इंच खंगाल चुकी थी। इस दौरान जो पेट्रोलियम के इक्का-दुक्का छोटे-छोटे भंडार मिले थे, उन्हें उन देशों की सरकारों ने आपातकालीन रिज़र्व भंडार घोषित कर दिया था। अपने इन आपातकालीन पेट्रोलियम भंडारों की सारे राष्ट्र बड़ी तन्मयता से कड़ी सुरक्षा करते थे...इनके बारे में पूरी गोपनियता बरती जाती थी। सब जानते थे कि अगर विश्व युद्ध हुआ तो ये पेट्रोलियम के भंडार उनमें निर्णायक भूमिका निभाएंंगे और ये ही दुश्मन के आक्रमण का पहला निशाना होंगे।

जन सामान्य के लिए पेट्रोलियम के उपयोग पर रोक लगा दी गई। पेट्रोलियम का किसी भी रूप में जन सामान्य द्वारा प्रयोग अपराध घोषित कर दिया गया। धुआं उड़ाती मानवता का चक्का जाम हो गया। चोरी-चुपके भंडार किया 'ब्लैक' का पेट्रोल आखिर कब तक चलता?सारे वाहन धीरे-धीरे सिर्फ गैराजों की शोभा बनकर रह गए। जब उन्हें चलाने के लिए ईंंधन ही नहीं तो वाहनों का क्या होता? वाहन निर्माता कम्पनियॉं धड़ा-धड़ बन्द होने लगीं या फिर से साइकिलों के निर्माण में उतर आईं। तभी कुछ लोगों ने स्थानीय स्तर पर इन वाहनों के साथ अनूठे प्रयोग करने शुरु कर दिये। वे अपने पुराने वाहनों, खासकर चौपहिया वाहनों में जानवरों को जोतने लगे। लोग इसमें तेज दौड़ने वाले जानवर जोतन लगे जैसे कि घोड़े, बैल, ऊंंठ आदि। भारत में व्यवहारिक रूप से बैलों को इस कार्य के लिए सबसे उपयुक्त और किफायती पाया गया। इसमें एक रस्सी या लोहे की छड़ की सहायता से कार के आगे दो बैल जोते जाते थे और कार में लोग बैठते थे। बैल इस कार को खींचते थे। कार के आगे का शीशा या 'विंडस्क्रीन' हटा दिया जाता था ताकि लोग कार के अंदर बैठे-बैठे ही बैलों की रासें पकड़ कर वहीं से बैलों को नियंत्रित कर सकते थे। इस स्थानीय आविष्कार को लोग 'बुलौक कार' या 'बैलों वाली कार' कहते थे।

ये बीसवीं शताब्दी में प्रचलित बैलगाड़ी का संशोधित संस्करण मालूम देता था। धीरे-धीरे बहुत सारी बंद पड़ी चौपहिया वाहन निर्माता कंपनियॉं इस धंधे में आ गईं। 'बुलौक कार`  में नये-नये प्रयोग किये जाने लगे। अब चौपहिया वाहन निर्माता कंपनियॉं कार भी सप्लाई करती और इससे जुतने वाले बैल भी। इसमे जुतने वाले बैलों को चारा आदि देने की जरुरत नहीं थी। वैसे ही जानवरों का चारा जैसी फालतू की चीज उगाने के लिये उस बत्तीसवीं शताब्दी में जमीन कहां मिलती जबकि इन्सानों के भोजन की जरुरी चीजें उगाने भर की जमीन ही नहीं बची थी। इन जानवरों को भी भोजन के रुप में प्रयोगशालाओं में विकसित की गई विटामिन और पोशक तत्वों के 'क्न्सन्ट्रेट' से बनी 'लाइफ टैब्स' खिला कर ही पाला जाता था जो आसानी से हर जगह उपलब्ध थे।

इन बैलों या जानवरों के मस्तिष्क में एक छोटे से आपरेशन के जरिये एक कम्प्यूटर माइक्र्रोचिप फिट कर दी जाती थी। कार के अंदर भी एक लगा होता था। इस कम्प्यूटर से सिग्नल भेजकर कार में बैठे-बैठे ही उन बैलों के मस्तिष्क में लगी माइक्रोचिप की सहायता से उन्हें तेज चलने, धीमे चलने, रूकने, दाएंं या बॉयें मुड़ने के निर्देश दिये जाते थे जिनका वे सही-सही पालन करते थे। पर इस माइक्रोचिप का उनके पूरे मस्तिष्क पर नियंत्रण नहीं था। फिर भी वह थे तो जानवर ही, वे कभी- कभी  इस मिनी कम्प्यूटर के आदेशों को झुठला जाते। ऐसे में बैलों को वापस कम्पनी भेजना होता जहॉ या तो उनकी ये कम्प्यूटर माइक्र्रोचिप बदल दी जाती थी या फिर बैलों की नई जोड़ी ही सप्लाई कर दी जाती थी। ये बैलों वाली कारें, अब खूब प्रयुक्त होने लगीं थीं पर ये धनवानों तक ही सीमित थीं। आम आदमी में प्रचलित वाहन थी साईकिल - पैरों से चलाई जाने वाली या फिर विकलांगों द्वारा हाथों से चलाई जाने वाली साईकिल। लोग अब लम्बी यात्राएं कम ही करते। नाव यात्रा अब काफी विकसित होने लगी थी। पेट्रोलियम की समाप्ति ने लोगों के विकास के क्र्रम को पीछे की ओर, उल्टे पांव चलने को मजबूर कर दिया था।

राजू आज ऐसे ही बैलों वाली कार से अपने पिता के साथ अपने हॉस्टल से वार्षिक छुट्टी में घर लौट रहा था। सड़क थोड़ी खराब थी इसलिए उन्होंने कार में मिनी कंप्यूटर के जरिए बैलों को मध्यम गति से चलने के आदेश दे दिए थे। अचानक न जाने क्या हुआ? कार में जुते बैल भड़क उठे। इस उबड-खाबड़ सड़क पर वे बैलों वाली कार लेकर सरपट दौड़ने लगे। राजू के पिता कार में मिनी कंप्यूटर से जितना उन्हें नियंत्रित करने के आदेश देते तो वे उतना ही सरपट भागते। कार उलटने-उलटने को हो जाती। राजू के पिता के माथे पर पसीना चुहचुहाने लगा। राजू भी परेशान था। उसने घबराकर पूछा- `पापा यह सब क्या हो रहा है?

"मैं खुद भी नहीं समझ पा रहा हूंं बेटे। कंप्यूटर से कोई भी आदेश दो, कोई सिग्नल दो बस बैल भड़क कर भागना शुरू कर देते हैं। लगता है बैलों के मस्तिष्क में फिट माइक्रोचिप से सिग्नल लीक होने लगे हैं जिससे चिप के चारों ओर का उनका मस्तिष्क इन अनावश्यक सिग्नलों को ग्रहण करने लगा है।"
"पर ऐसा क्यों पापा," राजू काफी घबरा रहा था।
"माइक्रोचिप के आसपास के मस्तिष्क के ऊतकों में इनफेक्शन होने या सूजन होने से ऐसा हो जाता है और वे सामान्यत: माइक्रोचिप से निकलने वाले वीक सिग्नल, जिन्हें स्वस्थ दशा में वे जान भी नहीं पाते, को ग्रहण करने लगते हैं। इसलिए हमारे हर कमांड पर उनके मस्तिष्क के इस सूजे भाग को एक बिजली का सा झटका लगता है और वे बिलबिलाकर दौड़ना शुरू कर देते हैं।"
"अब क्या होगा पापा?"
"यही मैं भी सोच रहा हूंं बेटे। जब कार के निर्माता हमें बैल सप्लाई करते हैं तो वे दोनों बैलों के मस्तिष्क में फिट इन "माइक्रोचिप" को पूरी तरह सिनक्र्रोनाइज़ करते हैं ताकि हमारे मिनी कंप्यूटर पर दिए गए एक कमांड को दोनों बैल एक ही तरह समझें।"
"पर अब पापा?"
"राजू बेटे लगता है कि एक बैल के माइक्रोचिप के आसपास के मस्तिष्क के ऊतकों में इनफेक्शन होने से वह सिंक्रोनाइजेशन समाप्त हो रहा है।"
"इसका मतलब पापा?"
"इसका मतलब यह कि हमारे सिग्नल को एक स्वस्थ बैल एक तरह से ग्रहण कर रहा है और इनफेक्टेड मस्तिष्क वाला बैल दूसरी तरह से।"
"यह तो बहुत खतरनाक होगा पापा, एक बैल दौड़ना चाहेगा तो दूसरा धीमे चलेगा, एक दाएं जाएगा तो दूसरा बाएं...यानि की हमारी कार कभी भी पलट सकती है?
"हॉ," पापा ने चिन्तित स्वर में कहा।
"पापा अगर हम बैलों को कोई भी सिग्नल न दें तो?"
"राजू मैं ऐसा कर रहा हूंं, पर इनफेक्टेड बाएंं बैल की माइक्र्रोचिप से सिग्नल लीक होना रूक ही नहीं रहा।"
"हे भगवान अब क्या होगा?"
"पता नहीं पर मैं कोशिश करूंगा...अंत तक कोशिश करूंगा।"
"पर कैसे पापा?"
"सोचता हूँ कार के बोनट तक किसी तरह पहुंंच जाऊंं और बैलों को कार से जोड़ने वाली रॉड को काट दूंं।"
"पर ऐसी उछलती, सरपट दौड़ती कार में पापा...नहीं पापा बहुत खतरनाक है यह...नहीं पापा नही..."                                              
"नहीं बेटे मुझे ऐसा करना होगा...मैं तुम्हारा पापा हूंं न। यकीन करो मुझे कुछ नहीं होगा।"
             
राजू के पापा ने उस तेज और धक्के खाती कार का दरवाज़ा खोला फिर वे खिसक कर कार के बोनट की ओर बढ़े। तभी कार एक खड्डे में जा गिरी और उलट गई।
राजू तेजी से चिल्लाया, "पापा"
"क्या हूआ बेटे," पापा राजू के ऊपर झुके उसका सिर सहला रहे थे।
"..."
"क्या हुआ, क्या कोई बुरा सपना देखा?" पापा पूछ रहे थे।
राजू ने धीरे-धीरे ऑंखे खोली। सामने पापा थे। वह पापा से लिपट गया, "पापा आप ठीक तो हैं न?"
"हॉं बेटे मैं बिलकुल ठीक हुंं पर तुझे क्या हुआ है?
" पर पापा, वह बैल...वह बैलों वाली कार...वह दुर्घटना..."
"ओहो! तो जनाब ने आज फिर कोई बुरा सपना देखा। कितनी बार तुमसे कहा है कि सोते समय उल्टे-सीधे कॉमिक्स न पढ़ा करो। तो क्या देखा आपने आज के इस सपने में?"
    
 राजू ने अपने पिता को अपने सपने के बारे में पूरी कहानी सुनाई। कहानी खत्म होते-होते राजू के पिता ने राजू के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए।
"पापा मुझे तो यकीन ही नहीं आ रहा है कि ये सब सिर्फ एक सपना था," राजू कह रहा था।
"सच कहते हो राजू सचमुच ये सपना नहीं था। तुमने बंद ऑंखों से हमारा आने वाला कल देखा है...ऊर्जा के संसाधनों के साथ जो अति हम आज कर रहे हैं उसका दुष्परिणाम देखा है...शायद प्रकृति तुम्हारे माध्यम से हमें चेतावनी दे रही है," पापा कहीं दूर देख रहे थे।
"मैं समझा नहीं, क्या कह रहें हैं आप?"
"राजू जिस रफ्तार से ये दोपहिये और चौपहिये वाहन बढ़ रहे हैं, अगर वही रफ्तार जारी रही तो क्या होगा? कहां से आएगा उनके लिए इतना पेट्रोल, इतना डीजल?"
"..."
" हमें थोड़ी दूर जाना हो तो क्या जरूरी है कि हम बाइक से ही जाएंं...कार से जाएंं? साइकिल पर भी जा सकते हैं...जैसे कि तुम अपने स्कूल।"
"समझा पापा, समझा, इससे पेट्रोल बचेगा और कसरत भी होगी।"
"हॉं, आज लोग कार से जाते भी हैं तो हर कार में सिर्फ एक आदमी। ऐसा भी तो किया जा सकता है कि एक ही जगह जाने वाले ऐसे पांच-छ: लोग बारी-बारी से किसी एक की कार में एक साथ जाएंं। लोग कार और मोटर साइकिल पर हवाखोरी और टहलने के लिए निकलते हैं। अरे ये कैसी हवाखोरी, टहलना हो तो पैदल जाओ।"
"मैं तो पापा अब साइकिल से ही स्कूल जाया करूंगा। हॉस्टल से स्कूल है ही कितनी दूर," राजू ने उत्साहित होकर कहा।
" और क्या साइकिल चलाना कोई शर्म की बात तो है नहीं। चीन में तो अस्सी प्रतिशत लोग साइकिल का ही प्रयोग करते हैं," पापा ने जानकारी दी।
"इससे तो पेट्रोलिंयम की कितनी सारी बचत होगी, है न पापा?"
"हॉं आज लोगों को मालूम है कि 'जेट्रोफा' जैसे पौधों से वाहनों में प्रयोग किया जाने वाला डीजल बनाया जा सकता है पर आम आदमी की तो इसमें रूचि ही नहीं। अगर ये चीजे हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में प्रवेश न पा सकी तो न जाने कल क्या होगा," पापा ने गहरी सॉंस ली।
"मैं बताऊंं पापा, बैलों वाली कार होगी पापा बैलों वाली कार," राजू ने कहा और दोनों खिलखिला कर हंस पड़े।

-- डॉ. अरविंद दुबे



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