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सही राह पर

वर्षा बन्द हुई। मेघों के उड जाने पर,स्वच्छ नीले आकाश में तारे मुस्कुराने लगे, मानो बादलों को परास्त करके अपनी विजय पर प्रसन्न हो रहे हों। पूर्व दिशा में एक अकेले आवारा मेघ-खन्ड की स्थिति,"आई वान्डर्ड एस अ लोनली क्लाउड" कविता की याद दिला रही थी।

सहसा ही बदली के फ़ट जाने पर ओट से प्रकाश के सौरभ-कण फ़ैलाता हुआ चांद निकला, जिसकी विभा से उस निष्तब्ध बिभावरी में जगती तल विभोर हो गया। उमडती हुई नदी भी इठलाती हुई प्रियतम सागर से मिलने की आतुरता लिये बही चली जा रही थी। नदी के किनारे खडे हुए दो युवक बरसात में भीगने का आनन्द लेते हुए उसके विशाल प्रवाह को देख रहे थे।

"ओह! व्हाट अ गुड साइट इट इज़," नदी को एकटक देखते हुए अतुल उछल पडा,"कल-कल करके अविरल गति से बहती हुई नदी', 'कष्ट पडें चिन्ता न करो तुम..' या 'लेट अस बी अप एन्ड डूइन्ग'-कविता की याद दिलाती है। लहरें मानो परिहास करतीं हैं कि, खडे रहो मूर्ख अकर्मण्यों की तरह, हम तो चलीं।"

"कंकड-पत्थरों से, किनारों से तथा परस्पर घर्षण से उत्पन्न ध्वनि ही सुनाई देती है, नदी न कभी बोलती है, न बोलेगी," अनिल ने हंसते हुए कहा, "निर्जीव भी कहीं बोलते हैं?"

'मार्मिकं को मरन्दानामान्तरेण मधुव्रतं', 'बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद?' तुम वैज्ञानिक हो, ह्रदय हीन, प्रक्रति के वाक्यों, उसके रहस्यों, कलापों को क्या समझो? सत्यम-शिवम-सुन्दरम की परिभाषा क्या जानो?" अतुल बोला।

वैज्ञानिक सत्य के पश्चात ही तो वास्तव में शिवं, सुन्दरं की बात बनती है। बस कल्पना करते रहो, हाथ-पैर से कुछ न करना क्या उपयुक्त है? विज्ञान ने ही तो पॄक्रति के जाने कितने रहस्य खोजे हैं, अनिल ने कहा।

अतुल कहने लगा, "कल्पना तो विज्ञान में भी है, सपोज़ सच एन्ड सच इज़ ईक्वल टू एक्स, न हुई वस्तु को भी मान ही लो। परिकल्पनाओं के आधार पर ही तो अनुसंधान व उन पर निर्माण आदि होते हैं। साहित्य की कल्पना, अन्तर्बुद्धि,'जहां न जाय रवि वहां जाय कवि' वाली भावना ही तो समाज़ को उच्चादर्शों पर प्रतिष्ठित करती है। उसे सुसभ्य, सुसंस्कृत बनाती है। बिना शिवम-सुन्दरम के विज्ञान का सत्य विनाशकारी है। एटम बम, उदज़न बम,हाइड्रोज़न बम क्या हैं व क्यों?"

"यही तो भूल है विज्ञान के प्रति। शराब अंगूर से बनती है, तो अंगूर तो शराब नहीं है। गलती न विज्ञान की है न वैज्ञानिकों की। गलती तो अनुचित उपयोग करने वालों की है।" अनिल ने कहा, "फ़िर साहित्य की उन्नति भी तो विज्ञान के कारण हुई। प्रेस व कागज़ के आविष्कार के साथ-साथ ही तो साहित्य का भी समुत्थान हुआ। विज्ञान के बिना साहित्य ही कहां उन्नत होगा,फ़ैलेगा फ़ले-फ़ूलेगा?"

"ठीक, परन्तु आप भूल रहे है कि यदि साहित्य के रूप में प्राचीन ऋषियों, शास्त्रकारों, विद्वानों आदि की वाणियां, रचनाएं, पुस्तक, पुस्तकालय, रामायण, वेद, पुराण, गीता आदि ग्रन्थ व व अन्य साहित्य जहां से ज्ञान- विज्ञान का उद्गम है, नहीं होते तो विज्ञान की उन्नति कहां से होती? यदि वैदिक कर्म-काण्ड विज्ञान है तो वैदिक-व्यवहारिक व औपनिषदिक ज्ञान, साहित्य," अतुल बोला।

"मानते हैं, विज्ञान हो या साहित्य, सबका आदि श्रोत एक ही है; परन्तु साहित्य मनोरन्जन की वस्तु है, विज्ञान स्रजनात्मक कार्य है, मानव की प्रगति का वाहक," अनिल ने उत्तर दिया।

"सिर्फ़ मनोरंजन! कदापि नहीं," अतुल तर्क देता हुआ बोला, "विज्ञान तो सभ्यता के विकास के लिये सिर्फ़ सैद्दान्तिक व क्रियात्मक कार्य करता है, जबकि साहित्य मनुष्य को मनोवैज्ञानिक व अनुभवजन्य सैद्धान्तिक रूप से प्रेरित करता है। अनुभवों, भूलों, अनुचित-उचित का ज्ञान, कर्म व व्यवहार कास मन्वय, सन्चयन, नियमन, विनिमय व समाज़ में प्रचार - प्रसार, साहित्य द्वारा ही तो होता है। यदि किसी भाषा का साहित्य ही ठीक न हो तो विज्ञान के लिये उपयोगी ज्ञान व पुस्तकें आदि कहां से उपलब्ध हों। यदि साहित्य मानव को उन्नति के लिये प्रेरित न करे तब विज्ञान की गाडी कौन खींचेगा?"

"वैज्ञानिक," अनिल बोला।

"वैज्ञानिक भी तो मनुष्य ही है, देवता या जानवर तो नहीं," अतुल मुस्कुराया।

"मनोविज्ञान भी तो विज्ञान ही है," अनिल ने कहा।

"तो फ़िर दोनों एक हुए न," उत्तर मिला।

"हां, यह तो है, साहित्य व विज्ञान एक दूसरे के अभिन्न अंग हैं। दोनो को ही मानव सभ्यता के उत्थान में आवश्यक कारक मानना चाहिये," अनिल बोला।

"यही तो," अतुल ने कहा,"सदैव ही साहित्य व विज्ञान सभ्यता के दो स्तम्भ रहे हैं। जहां भी, जब भी वे भिन्न-भिन्न समझे गये, उनका अनुचित व तादाम्य रहित उपयोग हुआ ,वहीं विक्रति व विनाश हुआ।"

"हूं, वास्तव में विज्ञान व साहित्य में, वैज्ञानिक व साहित्यकार में,सदैवे एक तादम्य रहना चाहिये और दोनों को ही सम्यक व सम्मिलित रूप से मानव व सभ्यता के विकास पर ध्यान देना चाहिये," अनिल ने सोचते हुए कहा।

"आल राइट....।" अचानक ही पानी में दो मच्छों के लडने की आवाज़ ने दोनों का ध्यान भंग किया। चन्द्रमा को सिर पर देखते हुए अतुल बोला,"बहुत रात हुई ,चलो चलें।"

रास्ते में अनिल हंसकर पूछने लगा,"वे मच्छ क्या कह रहे थे, कवि महाराज़?"

"देर आयद, दुरुस्त आयद," अतुल मुस्कुराया।

-- डा श्याम गुप्त



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