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महान विस्फोट

पता नहीं कितने कल्पों तक
किसी को पता नहीं
मेरा हृदय मुट्ठी में बंद था
      न मुझे पता था
      कि सुबह सूरज
      किसी पहाड़ के पीछे से
      झाँकता है
      कि रात सूरज
      किसी झील की गोद में
      सो जाता है

मेरा कंदन भी
मुट्ठी के भीतर ही
घुटता था
मेरा दिक्काल
जो सीमित था मुट्ठी के भीतर ही

      फिर पता नहीं क्या हुआ
      आप कहें संभवतया बसंत आया
      इतनी जोर से धड़का मेरा हृदय
      कि गूँज रहा
      वह नाद
      अंतरिक्ष में आज तक
      और मुट्ठी खुल गई मेरी
      आकाशगंगा में डुबकी लगाने लगे
      करोड़ों तारे
      सजने लगी नीहारिकाएँ
      बडे आवेग में चल पडी मंदाकिनियाँ
      करने अभिसार

सहसा खुल गया अंतरिक्ष
आकाश हो गया नीला
अब जब रोती हो तुम
तब टूटने लगते हैं असंख्य तारे
जब मुस्कराती हो तुम
छा जाती है अरूणोदय की लालिमा
जब हंँसती हो तुम
धरा पर उतर आती है गंगा...



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by Dr. Radut.