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पृथ्वी का शोक गीत

जाग उठी सदियों से सुप्त पड़ी कृतियाँ,
उठने लगा बुझी आग से पुनः श्वेत धुआं,

तहों में दबे अवशेष अकुलाने लगे,
संचित हो जीवित हो पुनः बहार आने लगे,

रिसने लगा हिम पर्वतों से पुनः पवन जल,
बहने लगी श्वेत पुण्य नदियाँ कल कल, कल कल,

गहरे शाश्वत सागर से उठने लगे भीषण लहरों के ज्वर,
ऊपर विस्तृत आकाश को छूने वे मचलने लगे बार-बार ,

आकाश में घुमड़ने लगे पुनः बादलों के कारवां अनेक ,
सिमटते, बिखरते लाल, काले न जाने कितने ही सफ़ेद,

क्षितिज से उदित हुआ जलता सूर्या लाल,
सिमटा पुनः तुषार का विषम जाल,

अंगारों सी भीषण किरणें धरती पर बरसी,
तपने लगी सदियों से सर्द पड़ी परती,

काल के दंड ने किया तीव्र प्रहार,
समय चक्र का धुरा कंपित हुआ पुनः एक बार,

पर नहीं था कोई उस मौन व्रत को तोड़ने वाला,
अगणित टूटी लड़ को पुनः जोड़ने वाला,

न था कोई इंसान, पेड़ या पक्षी शेष,
विस्मृत हो गए थे उनके सभी जीवित अवशेष,

शेष थे सिर्फ हवाओं से बनते, बिगड़ते बवंडर,
भयानक आकृतियों से दीखते पाशाणिक पत्थर,

भटकतीं थीं तो केवल शोषित आत्माएं,
खामोश, बेबस, शोक विहल कोमल भावनाएं,

काल-कलवित कर चुका था जिन्हें वह इंसान रुपी दावानल,
अंश थे जिसके सभी - नभ, पृथ्वी, अग्नि, वायु और जल,

होम हो गए थे पुनः उस शाश्वत पदार्थ में,
वे बन गए थे आहुति उस मानव यज्ञ के स्वार्थ में।



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by Dr. Radut.