वाद

प्रतिवाद :- "यहाँ‌ शोध मे बहु-पत्नियों का जिक तो खैर नही किया गया है इस लिये उस पर कोई टिप्प्णी नहीं। अब आते है तार्किक्ता पर। खेतिहर पुरूष और शिकारी तथा घूमन्तू पुरूष मे समसे बडा अंतर है स्थायित्व। जहाँ घुमन्तु पुरूष...

प्रतिवाद

इससे पूर्व की हम बात आगे बढायें, आपको इस नये स्तंभ की थोडी जानकारी दे दें। हम रचनायें प्रकाशित करते हैं‌, उन्हे पढते हैं लेकिन उनका समालोचनात्मक विश्लेषण नही होता है। ब्लागिगं जगत की तू मेरी पीठ खुजा मै तेरी प्रवत्ति कल्किआन मे वर्जित है। इसीलिय...

कवितायेँ

  • साइ-फाइ-कू -- डॉ. अरविन्द दुबे


    इस आलेख का उद्देश्य हिन्दी कविता प्रेमियों को हिन्दी कविता की नवीनतम औ...

  • भारत माता -- डा श्याम गुप्त

    भाल रचे  कुंकुम केसर, निज हाथ में प्यारा तिरंगा उठाये।
    राष्ट्र के...

  • अति सर्वत्र वर्जयेत -- डा श्याम गुप्त

    कविता बनती है,
    करुणा दया ममता और प्रेम की-
    अनुभूति से;  और-...

  • प्लास्टिकासुर -- डा श्याम गुप्त

    पंडितजी ने पत्रा पढ़ा, और-
    गणना करके बताया,
    जज़मान ! प्रभु के -...

  • प्रकृति और हम -- हेमन्त द्विवेदी

    आकाश गंगा के कोने में तीव्र प्रकाश
    और फिर एक विस्फोट
    टिमटिमाती मण...

  • चाँद और फिज़ा -- निर्मला कपिला

    फिज़ा अब बस करो
    क्यों पीट रही हो लकीर
    तेरी लुट चुकी है तकदीर
    ...

  • मंगल -- निर्मला कपिला

    भेजी हैं
    नासा ने
    मंगल से
    कुछ तस्वीरें,
    कहा
    मंगल...

  • कम्प्यूटर आया -- डा श्याम गुप्त

    युग बदला दुनिया  बदली  कम्प्युटर आया।

    सबल सूचना तंत्र...

  • परिवर्तन -- रश्मि प्रभा

    अगर तुम चाहो
    तो परिवर्तन संभव है !
    पर,
    तुम इस चाह से परे...

  • श्री सूर्य -- राजेश्वर वशिष्ठ

    आसमान ढका है बादलों के शामियाने से
    जिसे ठीक से धो नहीं पाया मुहल्ले का...