एक भुल्क्कड महाशय शाम को खुशी खुशी घर लौटे और पत्त्नी से गर्व से बोले, "देखो आज मै नही भूला, छाता साथ लाया हूँ।" इस पर पत्त्नी बोलीं, "लेकिन आज तो आप छाता ले कर ही नही गये थे।"
भूल कर महाशय किसी और का छाता ले आये थे।
भुल्क्कडों को अकसर सामाजिक उलाहना मिलती रहती है। इसमे उस व्यक्ति विशेष का कोई दोष नही है -- अगर वैज्ञानिकों की बात मानें। वैज्ञानिक यह तो जानते ही थे कि नयी व, अल्प-कालीन यादाश्त जल्द ही धूमिल पड जाती है। लेकिन मक्खियों पर की गयी एक नयी शोध के अनुसार यह भुलक्कडपन यू ही नही होता है, बल्कि जानबूझ कर बहुत सी बाते भुलाई जाती हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार बहुत सी बातों को स्वत: भुला देने की प्रक्रिया शायद नयी सूचनाओं के लिये जगह बनाने के लिये महत्वपूर्ण है। यह शोध १९ फरवरी को विज्ञान शोध पत्रिका सेल मे प्रकाशित हुआ है।
"सीखने की प्रक्रिया जैविक यादाश्त का निर्माण करती है। लेकिन हमे पुरानी यादों को मिटा कर नयी यादों के लिये स्थान बनाना पडता है (यहाँ स्थान का अर्थ 'जगह' से न लें)," झिंगा विश्वविद्यालय के यी जांग ने बताया।
शोधकर्ताओं ने गहन जांच पडताले के बाद यह पता लगाया है कि इस प्रक्रिया का संबंध रैक नामक एक प्रोटीन से है। जब इस प्रक्रिया को बाधित कर दिया गया तो वैज्ञानिकों ने देखा कि मक्खियाँ नयी यादों को अधिक समय तक संजो कर रख पायीं।
मनोवैज्ञानिक स्तर पर वैज्ञानिकों मे लम्बे समय से यह बहस चलती आयी है कि हम क्यों भूलते हैं। एक विचार यह है कि नयी यादें आमतौर पर अस्थायी होती हैं और समय के साथ धूमिल पड जाती हैं। जबकी कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि जैसे जैसे नयी यादे बनती जाती है, वे पुरानी यादों को मिटाती जाती हैं।
इस नयी शोध से यह लगता है को उपरोक्त दोनो ही विचार सत्य हैं, कम से कम जैविक या आणविक स्तर पर तो यैसा ही है। हालाकि वैज्ञानिक इस गुत्त्थी को अभी भी नही सुलझा पाये हैं कि इस बात का निर्धारण कौन, या कौन से प्रक्रिया, करती है कि क्या याद रखना है और किसे भुला देना हैं।
शायद इसी लिये कहा गया है, "बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि लेय।"
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