ब्रह्माण्ड का अन्त कितनी दूर?
यह अन्त जिसकी हम बात कर रहे हैं निश्चित ही २०१२ वाला तो नहीं है।
पृथ्वी में पैट्रोल समाप्त हो जाएगा, कितु हम तब तक सूर्य के समान संगलन ऊर्जा पैदा कर सकें। हम इस तरह के अंत की बात भी नहीं कर रहे हैं। हम यह सोच रहे हैं कि सारे ब्रह्माण्ड में ही सब सृष्टि ही कृष्ण विवरो में समा जाएगी। या यह ब्रह्माण्ड फ़ैलते फ़ैलते इतना विरल हो जाएगा कि ब्रह्माण्ड का तापक्रम ही शून्य के लगभग हो जाएगा, तब कहीं भी कुछ भी नहीं हो सकेगा। या दूसरे शब्दो में कहें तब एन्ट्रोपी अर्थात अव्यवस्था (डिसआर्डर) इतनी बढ़ जाएगी कि व्यवस्था आ ही नहीं पाएगी। और तापगतिकी (भौतिकी) का दूसरा मूलभूत नियम कहता है कि यह अव्यवस्था लगातार बढ़ती है।
ब्रह्माण्ड की सृष्टि के समय यह अव्यवस्था या एन्ट्रापी सबसे कम थी। जैसे कि यदि यह सूर्य ठंडा हो जाए (लगभग ५ खरब वर्षों में ऐसा होने की संभावना है) तब पृथ्वी आदि ग्रहो में जीवन तो नहीं हो सकता। जितनी एन्ट्रोपी बढ़ती है सृष्टि के कार्य के लिये उतनी कम ऊर्जा बचती है। इसी तरह एन्ट्रोपी बढ़ते बढ़ते सारा ब्रह्माण्ड ही ठंडा हो जाए तब हम कह सकते हैं कि ब्रह्माण्ड का अन्त हो गया - वैसे न तो पदार्थ नष्ट हो सकता है और न ऊर्जा। किन्तु ब्रह्माण्ड अन्त की ओर अग्रसर तो है।वैज्ञानिक, जिज्ञासावश इस अन्त का अनुमान लगाते आ रहे हैं, क्योकि इस अनुमान का हम पृथ्वी वासियो पर कोई असर नहीं पड़ेगा - उसके बहुत बहुत पहले ही सूर्य की ऊर्जा समाप्त हो जाएगी।
आस्ट्रेलियाई राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के अनुसंधानी विद्यार्थी चैस एगन एवं डा.चार्ली लाइन वीवर ने समस्त ब्रह्माण्ड की एन्ट्रोपी का अनुमान लगाकर खोज की है कि पहले के अनुमानो की अपेक्षा उपरोक्त अव्यवस्था तीस गुनी अधिक पाई गई है। इस एन्ट्रोपी की अधिकता में विशाल कृष्ण विवरो का सर्वाधिक हाथ है।
डा. एगन ने कहा कि इस अनुसंधाने में अब अगला कदम यह खोज करना होगा कि अधिकतम एन्ट्रोपी हम से कितनी दूर है। अर्थात ब्रह्मान्ड का अन्त कितनी दूर है, कहना चाहिये कि कितने खरब वर्षों दूर है।
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- प्रिन्ट करॆ







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ब्रह्मान्ड..
धर्मग्रन्थ तो यही कहते हैं की