ओजोन छिद्र अब धीरे धीरे भर रहा है। लेकिन लीड्स विश्व विद्यालय के वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे दक्षिणी ध्रुव मे गर्माहट आयेगी।
कल्किआन अंग्रेजी मे प्रकाशित एक समाचार के अनुसार, पहले ऐन्टार्कटिका के ऊपर बना ओजोन छिद्र पर्यावारण के लिये सबसे बढा खतरा माना जाता था। लेकिन नये शोध से यह भी पता चला है कि इस छिद्र ने इस क्षेत्र को पिछ्ले दो दशकों से कार्बन के बढते स्तर से होने वाली गर्माहट से बचा कर रखा था। इन छिद्र के नीचे तेज आधिँयों ने चमकीले ग्रीष्मकालीन बादलों का निर्माण किया। यह बादल सूर्य की खतरनाक किरणों को परिवर्तित कर देते हैं।
"यह बादल एक प्रकार के दर्पण का काम करते हैं। और सूरज की किरणों को परिवर्तित कर देते हैं। इस परिवर्तन के कारण इस क्षेत्र मे कार्बन के बढते स्तर से होने वाली गर्मी को नियंत्रण मे रखते हैं।" इस शोध के सह-लेखक प्रो. केन कार्सला ने बताया।
ओजोन छिद्र के भरने से ऐसा प्रतीत होता है कि यह आँधिया अब धीरे धीरे खत्म हो जायेंगी और बढते कार्बन डाईआक्साईड स्तर की वजह से दक्षिणी ध्रुव के गर्म होने की प्रक्रिया तीव्र हो जायेगी।
इस नयी खोज की कुंजी ऐरोसोल हैं जिनकी वजह से पृथ्वी के वातावरण पर खासा फर्क पडा है। ऐरोसोल -- नन्हे परावर्ती कण होते हैं जो कि हवा मे तैरते रहते हैं -- घुँआ इसका सबसे बडा उदाहरण है। ग्रीन-हाउस गैसें पृथ्वी पर अवरक्त किरणों को सोख कर उसे वातावरण मे गर्मी के रूप मे छोड देती हैं। इससे समूचा ग्रह धीरे धीरे गर्म हो जाता है। ऐरोसोल इस प्रक्रिया के विपरीत काम करता है और सूर्य से आने वाली किरणों को वापस अंतरिक्ष मे भेज कर ग्रह को ठंढा रखता है।
ऐन्टार्कटिका के ओजोन छिद्र के नीचे चलने वाली आंधियाँ समुद्र से बढी मात्रा मे फुहारों को इक्ट्ठा करके बादलों का निर्माण करती हैं। यह बादल सूर्य की किरणों से प्रथ्वी को बचाते है। पिछ्ले दशकों मे मानव द्वारा ऐरोसोल के प्रयोग मे वृद्धी से इन बादलो के निर्माण मे बद्धोत्तरी हुई है।
अब माना यह जा रहा है कि ओजोन छिद्र के भरने से इस प्रतिक्रियात्मक प्रणाली मे गिरावट आयेगी और इससे शायद दक्षिणी ध्रुव के और गर्म होने की संभावना है।
'ग्लोबल वार्मिंग' के पीछे सत्य कम राजनीति अधिक है। अभी कुछ दिनों पहले ही विशेषज्ञों ने हिमालय पर किये गये गलत अध्यन के लिये क्षमा मागी थी। संचार माध्यमो मे इसे ले कर खूब स्याही खर्च की गयी। लेकिन पृथ्वी अपना ख्याल रखना जानती है।
पृथ्वी मानव से कहीं प्राचीन है, इस नीले ग्रह ने डायनासोर का जन्म तथा विनाश और क्या पता मानव सरीखी और भी प्रजातियों का जन्म और विनाश भी देखा हो। हम तो इस ग्रह के सामने क्षण भंगुर हैं। कई लोग कहते देखे जा सकते है -- ग्रह बचेगा तभी हम बचेंगे। मेरा उनसे अनुरोध है -- "ग्रह को कोई खतरा नही है, इंसान अपनी चिंता करे। खतरा इंसान को है।"
-- स्वपनिल भारतीय
सम्पादक - कटोंडा.काम
प्रमुख संपादक - कल्किआन हिंदी