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विज्ञान साहित्य

विज्ञान कथा

मुखौटे

उसके होठों पर एक रपटीली चुप थी और हाथों में वक्त के टूटे टुकड़े....हर टुकडा तीखी नोक वाला, उसके अपने ‘आप’ में चुभता सा, बिलकुल आइने के टूटे टुकड़ों की तरह, जिसमें उसे अपना ‘आज’ भी दिख रहा था और पिछला ‘कल’ भी। विचार ऐसे जुम्बिश खा कर रूक गए थे, मानो आगे रास्ता ही न रहा हो। बस दो ही घंटे की बात है, वह शारदा के पास पंहुच जाएगा। कैसी हो गई होगी वह वक्त के हाथों में पिछले बीस सालों में उछलती, फिसलती।

सपनों का सच

बहुत-सी अटकलें, बहुत-सी गप्पें आपने सुनी होंगी, सुनाई होंगी। मैं जो सुना रहा हूं वह सचमुच गप्प नहीं है। दिक्कत यह है कि मेरे पास ऐसा प्रमाण भी नहीं है कि आपके सामने रख सकूं कि जो कुछ मैं कह रहा हूं वह एकदम सच है। मैं झूठमूठ प्रमाण जुटा भी लूं तो आप यकीन कर लेंगे, इसका कम से कम मुझे यकीन नहीं है।

लव बियांड टाईम: Love Beyond Time

कोई कथा क्या सिर्फ़ विज्ञान के भारी - भरकम सिद्धान्तों पर आधरित होने पर ही विज्ञान कथा बनती है, या विज्ञान के तकनिकी स्पर्श से अभिभूत मानवीय अह्सास भी विज्ञान कथा का रूप ले सकते हैं, यह विमर्श समिक्षकों पर छोडते हुए बात करते हैं - राज की.  न - न, राज से मेरा तात्पर्य किसी सिक्रेट चीज से नहीं बल्कि तीसरी सहस्त्राब्दी के उन इन्सानों में एक से है, जिनके पास भूख - प्यास जैसी शारीरिक आवश्यकताओं

रचनाकार: 

बर्बरीक उवाच

कितना अन्तर है, इस प्राकृतिक वायु में, जो अभी भी परिस्थितियों के कारण अपने नैसर्गिक रूप में सुरक्षित है। उन एटामिक-शेल्टरों में, परमाणु रोधी सुरक्षा कक्षों में वास कर रहे व्यक्तियों को यह सौभाग्य कैसे मिल सकेगा। हिमालय के उस ऊंचें शिखर पर बैठा मैं, असुर बालक बर्बरीक पृथ्वी पर चल रहे मृत्यु के नर्तन को, हत्या, मानव हत्या के ताण्डव को जाग्रत होकर तटस्थ भाव से देख रहा हंू। एक पल रुकिये। वह विनाशकारी विस्फोट, परमाणु बम का विस्फोट जो अभी अमेरिका के न्यूयार्क नगर पर हुआ है उसकी सेसमिक वेब्ज, कम्पन युक्त भू-तरंगों की अनुभूति मैं कर रहा हूँ। मैं आप को उन आतंकवादियों की नृशंस गतिविधियों से, जो मानव के मानवता के विनाश के प्रयास में लिप्त हैं, के विषय में बताता रहूंगा।"

एक शहर की मौत

आज उस शहर की अन्तिम निशानी भी पानी में समा गई। ये उसके घंटाघर के ऊपर लगे तड़ित चालक की नोंक थी। वैसे तो ये अपने आप में कोई खास चीज नहीं थी पर परिस्थितियों के चलते ये उस मरते शहर की पहचान बन गई थी। हर रोज कुछ तमाशबीन उस डूबते हुये शहर को देखते जुड़ते, आपस में बातें करते, "अरे अभी तो उस घंटाघर का गुम्बद दिख रहा है.....लो आज उसका आखिरी कंगूरा भी डूबा...अब तो बस तड़ित चालक का सरिया ही बचा है....।"

उंगलियाँ

इस जगह पर आने की कभी भी उसकी इच्छा नहीं थी पर क्या करे। कोई दूसरा विकल्प भी तो उसके पास नहीं था। उस पर बेहोशी के इंजेक्शन का प्रभाव क्रमशः उसी भाँति छाता जा रहा था जिस प्रकार वर्षा ऋतु में बादल धीरे-धीरे सूर्य को अच्छादित कर लेते हैं। उसका अचेतन मस्तिष्क कार्यरत था।

डॉ. अलबर्तो वापस न आ सके

उसकी गैस चालित पीजो कार का पैडिल, हाँ वह एक्सीलेटर को पैडिल ही कहता था, कुछ ढीला हो गया था। उसे टाइट कराना आवश्यक हो गया...वह ड्राइव करते हुये अगले गैस-फिलिंग स्टेशन पर रुका, मैकेनिक को समस्या बताई और कार से उतर पड़ा। वह गैसे ड्रिवेन कार को पूर्णतः प्रदूषण मुक्त मानता था....इसी कारण वह लेड-विहीन पेट्रोल के स्थान पर गैस-चालित कार,  पीजो कार, चलाता था। फिर इस में प्रदूषण टेस्ट नहीं कराना पड़ता था और न ही किसी प्रकार के फाइन की ही समस्या रहती थी, वह सोच रहा था।

दान

"तुमने राजा रवि वर्मा का नाम तो सुना होगा?"

"हाँ क्यों नहीं। वे तो आधुनिक भारतीय चित्रकला के प्रणेता थे" जार्ज पोलस का उत्तर था। कुछ पल बाद उसने मेरी ओर देखा और कुछ सोचकर कहने लगा- "तुम्हारी राजा रविवर्मा की पेन्टिग कुमुद सुन्दरी के विषय में क्या राय है?" मैनें उससे कहा कि "वह तो बिलकुल तुम्हारे बगल में बैठी, सुन्दरी मित्र फिलोमिना की तरह है।" मेरी बात सुनकर फिलोमिना जो अभी तक कॉफी के घूँट ले रही थी बरबस बोली "यह बात मात्र अंशतः सत्य है, मैं कुमुद सुन्दरी की भाँति पृथुल नहीं हूँ और न ही मैं बंगलौरी पद्द्ति पर साड़ी ही पहनती हूँ।"

2021

वर्ष 2021, सूचना क्रांति के दौर की जो शुरुआत 20 वीं सदी के उत्तरार्ध में आरम्भ हुई थी, वह अब अपने चरम पर थी. सूचना के निर्बाध प्रवाह ने आम जीवन शैली को काफी सरल बना दिया था, वहीँ कई नई किस्म की समस्याएं भी खड़ी होने लगी थीं. पूरे विश्व में फैले विभिन्न आतंकी संगठन भी अब उच्च तकनीक से लैस हो चुके थे, और वैश्विक अस्थिरता कायम करने के लिए विभिन्न देशों के इन आतंकी गुटों का एक कम्युनिकेशन नेटवर्क ही स्थापित हो चुका था. इस चुनौती से निपटने के लिए अन्तराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशों की एकजुट पहल स्वाभाविक ही थी.

रचनाकार: 

मुर्दे की आवाज़

एक पूरी तरह सुनसान सड़क थी यह। दूर-दूर तक फैले जंगल अमावस्या की रात को और भयावह बना रहे थे। यह दृश्य किसी भी अकेले व्यक्ति का रक्त जमा देने के लिये पर्याप्त था। लेकिन यह व्यक्ति शायद कुछ ज्यादा ही निडर था। काली जैकेट और इसी रंग की पैंट में वह बहुत आराम से चलता हुआ एक दिशा में बढ़ रहा था। एक पेंसिल टार्च की रौशनी उसे आगे का रास्ता दिखा रही थी।

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by Dr. Radut.