कितना अन्तर है, इस प्राकृतिक वायु में, जो अभी भी परिस्थितियों के कारण अपने नैसर्गिक रूप में सुरक्षित है। उन एटामिक-शेल्टरों में, परमाणु रोधी सुरक्षा कक्षों में वास कर रहे व्यक्तियों को यह सौभाग्य कैसे मिल सकेगा। हिमालय के उस ऊंचें शिखर पर बैठा मैं, असुर बालक बर्बरीक पृथ्वी पर चल रहे मृत्यु के नर्तन को, हत्या, मानव हत्या के ताण्डव को जाग्रत होकर तटस्थ भाव से देख रहा हंू। एक पल रुकिये। वह विनाशकारी विस्फोट, परमाणु बम का विस्फोट जो अभी अमेरिका के न्यूयार्क नगर पर हुआ है उसकी सेसमिक वेब्ज, कम्पन युक्त भू-तरंगों की अनुभूति मैं कर रहा हूँ। मैं आप को उन आतंकवादियों की नृशंस गतिविधियों से, जो मानव के मानवता के विनाश के प्रयास में लिप्त हैं, के विषय में बताता रहूंगा।"