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भारत में विज्ञान कथा के उत्साहवर्धन की आवश्यकता

यह तो एक सुखद समाचार है कि विज्ञान कथा पर एक गैर विज्ञान कथा की भरी पूरी अंग्रेज़ी की प्रभावशाली पत्रिका - 'डाउन टु अर्थ' – के जनवरी‌२०१२ के अंक में पूरे २७ पृष्ठ दिये गए हैं। यह विज्ञान तथा पर्यावरण की पाक्षिक पत्रिका है।

यह घटना न केवल विज्ञान कथा के लिये शुभ संकेत है, वरन विज्ञान, पर्यावरण, आर्थिक दशा, प्रौद्योगिकी, और समस्त जीवन के लिये शुभ संकेत है। विज्ञान तथा विज्ञान कथा दोनों एक दूसरे के सहायक हैं। किन्तु विज्ञान कथा पढने वाले की दृष्टि मात्र विज्ञान वाले की तरह एकांगी न होकर संतुलित हो जाती है।

यह कैसा जनतंत्र है

कि जनता को ज़बर्दस्ती अंग्रेज़ी पढ़ाकर गूंगा बनाया जा रहा है;

कि यह सरकार जब हिन्दी को नहीं हरा पा रही है तब हिंग्लिश को मान्यता दे रही है

कि न चाहते हुए भी

उसके बच्चों को इंग्लिश पढ़ाया जा रहा है;

जो यह समझ रहे हैं कि यह आक्रमण केवल हिन्दी पर है, वे भूळ कर रहे हैं कयोंकि यह हमला समस्त भारतीय भाषाओं पर है;

अब जनता हिन्दी, बांग्ला, मराठी, कन्न.ड, तमिल, उड़िया, गुजराती‌ नहीं वरन हिंग्लिश, बंगिंग्लिश, मराइंग्लिश, कन्निंग्लिश, तमिंग्लिश, उड़िंग्ग्लश, गुजिंग्लिश बोलेगी;

वह नहीं जानती कि भ्रष्ट भाषा से भ्रष्ट संस्कृति ही आएगी

यह भी‌ विज्ञान का एक चमत्कार होगा

जमीन से कोई ८ या १० किमी. ऊँचाई के प्रधार धारा से पवनचक्कियों द्वरा बिजली पैदा करना, यह विज्ञान कथा नहीं, एक वैज्ञानिक प्रयोग है।

कोलोरेडो कैलिफ़ोर्निया की एक कम्पनी के परियोजना अधिकारी डेविड शेपर्ड एक अद्भुत परियोजना पर कार्य कर रहे हैं।

उस पवन चक्की को वहां स्थिर कैसे रखा जाएगा, उसकी‌ बिजली को नीचे कैसे लाया जाएगा ? उसकी मरम्मत कैसे होगी? लगता है यह सब हवाई बाते हैं ! 'विमान' के आविष्कार के पहले उसे 'हवाई बातें ही‌ कहा जाता था !

क्या वैज्ञानिक भी कट्टरवादी (फ़ंडामैण्टलिस्ट ) हो सकते हैं ?

एक बहुत प्रसिद्ध विज्ञान लेखक हैं - मार्टिन गार्डनर – जिऩ्हें आधुनिक संशयवादी (स्कैप्टिक्स) आन्दोलन का संस्थापक भी‌ कहा जाता है। उऩ्हें‌ गणित तथा विज्ञान के लेखन में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। उनके विषय में एक लेख प्रसिद्ध विज्ञान पत्रिका - 'संदर्भ' (एकलव्य प्रकाशन) में‌ प्रकाशित हुआ है, जो उनके लेखन और व्यक्तित्व की उपयोगी‌ जानकारी देता है।

कुछ बात है कि हस्ती मिट रही है हमारी

क्या बात है कि कोई पढ़ता नहीं कहानी
कुछ बात है कि हस्ती मिट रही है हमारी

साहित्य पढ़ने वालों की संख्या निरंतर गिर रही है, फ़िल्म और् क्रिकैट देखने वालों की संख़्या घातांकीय (एक्सपोनैंशियल) दर से बढ़ रही है ! क्यों? ज्ञान का अधार जितना मजबूत होगा हमारे निर्णय उतने ही विश्वसनीय होंगे। . क्या उत्तम सोच विचार अज्ञान के आधार पर हो सकता है? क्या अज्ञानी व्यक्ति समस्याओं के सही‌ हल सुझा सकता है?

आज स्कूलों में परीक्षाएं पास करना भी अनिवार्य नहीं। क्या ऐसे विद्यार्थियों के पास विचार करने के लिये आवश्यक ज्ञान होगा? क्या ऐसे पढ़े हुए अपढ़ व्यक्ति जनतंत्र के जिम्मेदार नागरिक बन सकेंगे?

डार्विन का सिद्धान्त आण्विक स्तर पर भी खरा

आनुवंशिकी का लामार्क सिद्धान्त तो खारिज कर दिया गया था और डार्विन के सिद्धान्त को पूरी‌ मान्यता मिल गई थी। लामार्क का सिद्धान्त कहता है कि संतति में वे गुण भी आते हैं जो माता पिता ने अपने जीवन में‌ अर्जित किये हैं। जैसे कि सशक्त माता पिता के बच्चे सशक्त होंगे। यह सतही तौर पर ठीक लग सकता है, किन्तु थोड़े से अवलोकन से इसकी गलती स्पष्ट हो जाती है, क्योंकि ऐसा हमेशा नहीं देखा जाता । इसको यदि और सोचा जाए तो अंधे का बच्चा अंधा होना चाहिये, क्योंकि अन्धपन भी तो एक गुण हो सकता है, जो कि माता या पिता के जीवन में हुआ हो, और उऩ्हें आनुवंशिकता में न मिला हो ।

विज्ञान कथाओं की दुर्लभता

यह सभी जानते हैं कि भारत में विज्ञान कथा अन्य साहित्य की तुलना में बहुत प्रचलित या लोकप्रिय नहीं है । किन्तु यह भी माना जा रहा था कि भारतीय भाषाओं की तुलना में अंग्रेज़ी में अधिक भारतीय विज्ञान कथा की रचनाएं मिलेंगी. अंग्रेज़ी ई पत्रिका के पिछ्ले पांच माँह के अनुभव से एक आश्चर्यजनक बात सामने आ रही है, (अब तो बारह माँह का अनुभव भी‌ इसी तथ्य की पुष्टि करता है कि भारत में अंग्रेज़ी में मौलिक विज्ञान कथाएं भारतीय भाषाओं की तुलना में कम मिल रही हैं) जब कि फ़ोंट्स तथा कम्प्यूटर संबन्धी कठिनाइयां अंग्रेजी की अपेक्षा हिन्दी वालों को लिये कहीं अधिक हैं ।

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by Dr. Radut.