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कहानी

मुख्याधारा की कहानियां

इल्ट्रोसारस

बारहवें देवासुर संग्राम के उपरान्त देवताओं,असुरों और दानवों में समझौते की बातचीत प्रारम्भ हुयी। यह निश्चित हुआ कि असुरा गण दजला और फरात नदियों के बीच वाले समस्त भू-भाग पर अपना साम्राज्य स्थापित करें और दानव लोग जो जननी दनु की संतान थे, मध्य क्षेत्र की उस तीव्र गति से बहती हुयी नदी, जिसका नामकरण दनूब हुआ था के उस पार के समस्त भू-क्षेत्र पर अपना अधियत्य जमायें। सभी ने बात मान ली यह जान कर उनके पिता महर्षि कश्यप और माताएँ, दिति, अदिति और दनु प्रसन्न हों गयीं। महर्षि कश्यप आधुनिक कैस्पियन सागर-उन्हें के नाम पर विख्यात कश्यप सागर की सुरम्य भूमि पर स्थित, अपने आश्रम में आनन्द से, पत्नियों के साथ

रचना: 

छोटे साहब

    अनेक शतब्दियों पूर्व, नचिकेता ने यमराज से ब्रह्मज्ञान के, लिए आत्मा के विषय में ज्ञान के लिए जिज्ञासा प्रकट की थी। यमराज ने उसे आत्मा के विषय में बताया था। वह आत्म-ज्ञान से युक्त हो गया।
    पर सुबोधन को आत्म ज्ञान कौन देता है, और कैसे देता है क्या आप जानते हैं? यदि नहीं तो....।

रचना: 

उसने सिकन्दर को मार डाला

उसने इतिहास का अंग भंग कर दिया। उसने सम्राटों को नष्ट कर दिया और उनके साम्राज्यों का विनाश कर दिया। उसी के कारण नई-दिल्ली भारत की राजधानी नहीं रही। उसी के कारण पड़ोसी देश के भौतिकविद और परमाणुम जनक को को लोग गालियाँ देते हैं। मोहम्मद नादिर खाँ हर तरफ घृणा के पात्र हैं। वास्तव में ऐसा कुछ हुआ नहीं। वह एक प्रोफेसर था, क्वाटम फिजिक्स का और उसने अपने को ही, कल्पना के सहारे अवास्तविक बना लिया।

रचना: 

लघु कथा ---- विचित्र गोशाला

एक ऋषि थे; नित्य स्नान, ध्यान, श्रवण, मनन, निदिध्यासन तथा शिक्षण – प्रशिक्षण उनका जीवन था। उनका आश्रम था जो विशाल तो नहीं था, यद्यपि नालंदा या तक्षशिला से तो विशालतर ही था, सच कहें तो विराट था - जिसके उत्तर में हिमालय तथा दक्षीण में हिन्द महासागर था।
एक से वे चार हुए। वह आश्रम अपनी गोशाला के लिये प्रसिद्ध था, किन्तु उसमें सभी जानवरों का स्वागत होता था। किन्तु उसकी सबसे अधिक आश्चर्य वाली बात थी कि वे सभी जानवर जब वहां से निकलते थे तब वे मानव बनकर निकलते थॆ।

रचना: 

इक्कीसवीं सदी का मेरा नाती

“2 फरवरी को बसंत पंचमी है, सरस्वती की पूजा है”, मैने अपने नाती से यूं ही बात करने के इरादे से कहा।वह तो एक नामी गरामी कॉन्वैन्ट से 10 ट्ट 2 करने के बाद सैन्ट स्टीफैन्स में इंग्लिश ऑनर्स में पढ़ रहा है, और हॉस्टल से छुट्टियों में मेरे पास आ गया था।
“अरे नाना जी इतने साल आप वायु सेना में नौकरी करने और विदेशों में रहने के बाद भी इन आउट आफ डेट चीजें को मानते हैं।”

रचना: 

आज कुछ नहीं मेरे भाई आज सिर्फ महंगाई

लो फिर दाम बढ़ गए है, सुना है हमारे मनमोहन सिंह जी अर्थशास्त्री है, और वो व्यर्थ में कुछ करते नहीं है, सही है,  अब कसाब भाई जान का, और तिहाड़ में इतने बड़े बड़े VIP लोग बैठे है तो उनका रोज का खर्चा कहाँ  से चलेगा?
उन सब कि अच्छे से देख भाल तो हम लोगो को ही करनी है, आखिर वो हमारे जमाई है उनकी सेवा तो बनती है, अतिथि देवो भव: क्यों भूल रहे है हम?

रचनाकार: 
रचना: 

ताशमहल

गुसलखाने से तौलिया लपेटे हुए निकलते निशीथ को उसने कुछ झिझकते हुए रोक लिया, ‘‘सुनो!’’ पायदान पर गीले पाँव रगड़ते हुए निशीथ ने प्रश्न भरी दृष्टि से उसकी ओर देखा।
‘‘मेरा मतलब है...’’
"तुम्हारा मतलब है, मैं आज छुट्टी ले लूँ?’’
उसका परेशान चेहरा हिला।

रचना: 

अपनी वापसी

वह जाग गई

रचना: 

प्रमोशन

रचना: 

फातिमाबाई कोठे पर ही नहीं रहती

उसे लगा कि बरसों पुरानी घिसन से चिकनी हो आई लकड़ी की सीढ़ियों में रपटन हो रही है। पैर सावधानी से जमा-जमाकर नहीं रखे और बाईं तरफ जो ढबढबाते अंधेरे में काली चादर-सी तनी दीवार है, उस पर टेक के लिए पंजा नहीं जमाया तो निश्चित ही किसी भी क्षण दुर्धटना से उसकी भुठभेड़ हो सकती है। दीवार से पंजा छूते ही एक लिसलिसी चिकनाहट हथेलियों को भेदती पूरे शरीर में सिहर गई। मन एकबारगी घिना आया। न जाने कितनी और कैसी-कैसी हथेलियां टेक की खातिर इन दीवारों से चिपकी होंगी और ...उसे टॉर्च साथ लेकर आना चाहिए थी। लेकिन उसे क्या पता था कि इतनी खस्ताहाल सीढ़ियों और हिकाते अंधेरे से उसका पाला पड़ेगा।

रचना: 

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by Dr. Radut.