विश्व मोहन तिवारी
क्या अन्तरिक्ष के शून्य में प्रकाश सरल रेखा में गमन करता है ?
इस प्रश्न का तो उत्तर कब का दिया जा चुका है ! हमें तो यही पढाया गया है. आज भी यही पढाया जा रहा है. क्या उस उत्तर में संदेह है?
'आखेटक- फ़लाहारी' लोग 'घुमन्तू' नहीं होते
प्रतिवाद :- "यहाँ शोध मे बहु-पत्नियों का जिक तो खैर नही किया गया है इस लिये उस पर कोई टिप्प्णी नहीं। अब आते है तार्किक्ता पर। खेतिहर पुरूष और शिकारी तथा घूमन्तू पुरूष मे समसे बडा अंतर है स्थायित्व। जहाँ घुमन्तु पुरूष भोजन की तलाश मे दर दर ठोकरें खाता, प्रकृति के खतरों से दो चार होते हुये अनिश्चित्ता का जीवन जीता था, वहीं दूसरी ओर किसान एक ही स्थान पर रह कर सुरक्षा, भोजन की उप्लब्ध्ता सुनिश्चित करने के कारण समाजिक ढाचे मे सटीक बैठता होगा।
यूरोपीय पुरुष टाइग्रिस – यूफ़्रैटीज़ (लगभग परि- इराकी) क्षेत्र से आए
मुझे यह समाचार -- युरोपीय पुरूष पूर्व से आये किसानो के वंशज हैं -- पढ़कर तनिक सा आश्चर्य हुआ, क्योकि वहां के आधुनिक विचारक तो यही कहते आ रहे हैं कि पुरुष तो मंगल से आए हैं ! खैर पहला कथन समाज शास्त्रियो का है। दूसरा लैस्टर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिको का है जो (पब्लिक लाईब्रेरी आफ़ साईस) बायलोजी जरनल में प्रकाशित हुआ है। और यह युग वैज्ञानिको का है, अत: हम उऩ्हीं की बात मानेंगे।
शमा पर क्यों जलते हैं परवाने
दाग का एक शेर इस विषय पर सटीक बैठता है जो उन्होंने तेरह वर्ष की उम्र में लिखा था :
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मिठास
“काग्रेचुलेशन्स, मधु” वीणा ने खिलते हए गुलाब की तरह कहा।
“काहे का कांग्रेचुलेशन दे रही है?" ऋमधु ने स्नेहसिक्त स्वर में कहा।
“ अरे लो इस बार फिर दिल्ली विश्वविद्यालय ने तुझे युवा उत्सव की संगीत प्रतियोगिता के लिए चुन लिया है और तू कह रही है कि काहे का काग्रैचुलेशन।"
“अरे इस साल फिर वही होगा, ये शक्कर खोरे, जो गहराई में नहीं जा सकते फिर किसी मीठे गले में स्वर्ण – पदक की माला डाल देंगे।”
“नहीं नहीं अब की बार ऐसा नहीं होगा क्योकि इस बार रविशंकर भी आ रहे हैं।”
जादुइ यथार्थ की कथाएं (फ़ैन्टैसी)
फ़ैन्टैसी के लिये हिन्दी में संतोषजनक शब्द 'मायावी' या 'कपोलकल्पना' या 'जादुई यथार्थ' ही मिलता है । आज जिस त्वरित वेग से अंग्रेजी के शब्द ही अपनाए जा रहे हैं तो अधिकांश शायद यही कह दें कि हिन्दी में अलग शब्द ढूंढने की क्या आवश्यकता है, फ़ैन्टैसी ही अपना लें। विदेशी भाषा से शब्द ग्रहण करने में कोई विरोध नहीं होना चाहिये बशर्ते कि उस विदेशी शब्द के लिये हमारे पास उपयुक्त शब्द न हो। मेरा प्रयास यही है कि हम पता तो कर लें कि हमारे पास फ़ैन्टैसी के लिये कोई उपयुक्त शब्द है या नहीं।
ऐसा भी नहीं कि इस मायावी विधा का उपयोग भारत में पर्याप्त नहीं हुआ, खूब हुआ है। विश्च के पुरातनतम कवि वाल्मीकि की सर्वोत्कृष्ट रचना ' रामायण' में खूब हुआ है, और उसके बाद भी महाभारत में और फ़िर स्वयं रामचरित मानस में हुआ है। अनेक विद्वान तो इनमें वर्णित उन घट्नाओं को 'विज्ञान कथा' मानते हैं, यह नामकरण बहस का विषय हो सकता है, वह फ़िर कभी। रामायण के मायावी कार्य केवल राक्षस ही करते हैं, उनका यथार्थ से सम्बन्ध नहीं, वे एक भ्रम ही पैदा करते हैं। हनुमान जी का हिमालय से पर्वत उखाडकर लाना मायावी नहीं है वरन एक वरदान की शक्ति का याथार्थिक फ़ल है, अत: फ़ैन्टैसी है, कपोलकल्पना है, या जादुई यथार्थ है। अत: फ़ैन्टैसी के लिये मायावी शब्द पूरी तरह से उपयुक्त नहीं है।
कपोलकल्पना या अतिकल्पना के अर्थ एक तो रूढ हो चुके हैं, और दूसरे, किसी भी विधा के लिये यह नाम लम्बा-सा लगता है। हम 'कल्प्नातीत' शब्द पर थोडा विचार करें, इस शब्द का उपयोग हम तभी करते हैं जब कोई कल्पना सामान्य कल्पना से भी अधिक ऊंची हो या कहें कि अद्भुत हो। फ़ैन्टैसी में अद्भुत रस का होना आवश्यक् है। अत: कल्पनातीत फ़ैन्टैसी के लिये उपयुक्त शब्द हो सकता है।
जादुई यथार्थ फ़ैन्टैसी के लिये उपयुक्त लगता है और साहित्य में इसका उपयोग फ़ैन्टैसी के अर्थ में हो रहा है। जादुई शब्द में यथार्थ का विशेषण मह्त्वपूर्ण है क्योंकि यह उसे मायावी के अर्थ से अलग करता है इसमें जादू की तरह सब घटनाएं आकाश कुसुम की तरह केवल कल्पना में नहीं होतीं वरन यथार्थ से उनका सम्बन्ध रहता है वह चाहे कितना ही अदृश्य क्यों न हो। साहित्य में फ़ैन्टैसी के उपयोग में तर्क संगति या प्राकृतिक नियमों से संगति चाहे न दिखे, किन्तु उसमें एक आन्तरिक तर्क संगति आवश्यक या कहें अनिवार्य होती है।
क्या पाठक इस नाम पर अपने विचार देंगे?
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वैज्ञानिक दृष्टिकोण
"प्रौद्योगिकी के उपयोग में अर्थात न केवल उत्पादन में वरन उत्पादित वस्तुओं के उपभोग में भी वैज्ञानिक दृष्टि अत्यंत आवश्यक है, अन्यथा ऐसा समाज प्रौद्योगिकी का स्वामी बनने के स्थान पर उसका दास बन जाएगा।"
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हिन्दी में विज्ञान साहित्य की दशा और दिशा
हिन्दी में विज्ञान साहित्य की दशा, एक तो निश्चित ही हिन्दी की दशा पर निर्भर करती है और दूसरे, विज्ञान की दशा पर। भारत मे हिन्दी ही क्या सभी राष्ट्र्भाषाओ की दशा अन्ग्रेज़ी की प्रभुता के कारण दयनीय है। जब गरीब देश में नॊकरी के लिये अंग्रेज़ी अनिवार्य हो तब देशी भाषाएं कौन पढेगा!
महान विस्फोट
पता नहीं कितने कल्पों तक
किसी को पता नहीं
मेरा हृदय मुट्ठी में बंद था
न मुझे पता था
कि सुबह सूरज
किसी पहाड़ के पीछे से
झाँकता है
कि रात सूरज
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