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कौन सी है भारत की पहली विज्ञान कथा?

भारत में हम किसी विषय के अतीत पर चर्चा करें और वेदों का जिक्र न आये ऐसा तो हो ही नहीं सकता। मैं भी इसका अपवाद नहीं हूं। बात जब भारत की विज्ञान कथाओं के अतीत की है तो वेदों या धार्मिक गाथाओं से ही शुरू क्यों न करें? धार्मिक पुस्तकों के बहुत सारे स्थलों पर ऐसे आख्यान आते हैं जिन्हें देखकर सहज ही विज्ञान कथा का भ्रम होता है, त्रिशंकु का सदेह स्वर्ग गमन, गणेश के सिर पर हाथी के सिर का प्रत्यारोपण, नारद का तीनों लोगों में गमन (शायद किसी जुगाड़ के द्वारा) इन्द्र द्वारा कुपित होने पर बृज में घनघोर बृष्टि, दशरथ के पुत्रों का जन्म, घट से सीता की उत्पत्ति आदि ऐसे ही कुछ विवरण हैं।

क्या इन उद्धरणों को विज्ञान कथा की श्रेणी में रखा जा सकता है? आमतौर पर विज्ञानों की राय अलग-अलग है। कुछ विद्वानों के मतानुसार ये विवरण विज्ञान कथायें हैं ही नहीं तो कुछ के अनुसार ये विवरण इन कथाओं के बीच-बीच लेखक द्वारा प्रयुक्त फंतासियां है (1) जिसे लेखक ने जहां चाहा अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपने हिसाब से प्रयोग कर लिया। यहां पर ये विद्वान इन फंतासियों के साथ 'विज्ञान' शब्द जोडने से कतराते नजर आते हैं।

क्यों ये पुराण कथायें विज्ञान फंतासियां नहीं हैं?
इस प्रश्न के भी विद्वानों ने कई तरह से उत्तर दिये हैं। कुछ के हिसाब से तो इन फतासियों में जो भी वर्णन है वह विज्ञान है ही नहीं उसे महज चमत्कार या जादू-टोने से बढ़कर नहीं आंका जा सकता है। यहॉ विचारणीय प्रश्न ये है कि हम विज्ञान को परिभाशित कैसे करेंगे, किन मानदण्डों पर विज्ञान का मूल्यांकन करेंगे।

परिभाषा के अनुसार तो किसी घटना या वस्तु के 'सही' व 'व्यवस्थित' ज्ञान को ही विज्ञान कहा जा सकता है। यहॉ और सब तो ठीक है पर यही 'सही' शब्द सारे फसादों की जड़ है। आखिर किसी विचार या ज्ञान के सही या गलत होने का मूल्यांकन हम किस आधार पर करेंगे, उस समय उपलब्ध ज्ञान के आधार पर ही। जब ये उपलब्ध ज्ञान समय के साथ हर दिन बदल रहा है तो क्या इसके साथ सही व गलत के प्रतिमान नहीं बदलेंगे, किसी विचार या धारणा के वैज्ञानिक और अवैज्ञानिक मानने की कसौटियां नहीं बदलेंगीं? आज जब हम पुराण कथाओं में वर्णित इन दृष्टातों की बात करते हैं तो इससें वर्णित विज्ञान को उस समय के ज्ञान की कसौटी पर परखा जाना चाहिये न कि आज के वैज्ञानिक सिद्वान्तों पर। तब का वैज्ञानिक ज्ञान किस कोटि का रहा होगा?

मैं ये मानने को कतई तैयार नहीं हूं कि तब का विज्ञान आज के विज्ञान से ज्यादा समृद्ध रहा होगा। विज्ञान तो निरंतर समृद्ध होते जाने वाला विषय है। पैदल और पशुओं की पीठ पर यात्रा करने वाले लोग, आकाश यात्रा के लिये उस समय पंखों या चमत्कारिक मंत्रों तक ही सोच सकते थे, जडी बूटियों और टोटकों पर जिनकी चिकित्सा प्रणाली आधरित रही होगी वे यदि किसी चमत्कारिक 'अमृत जैसे पेय' द्वारा अमरत्व की कल्पना करें तो कुछ भी अवैज्ञानिक नहीं होगा क्योंकि यही उनके समय के विज्ञान  की परिसीमा और विस्तार था।

पुराण कथाओं के साथ एक और परेशानी है। आज का धार्मिक जनमानस इन्हें कहानियों की तरह नहीं इतिहास की तरह देखता है। उनके लिये इन पुराण कथाओं में वर्णित घटनायें सचमुच में घटित हुई होतीं हैं। इन पर बहस करते समय जब वे कालक्रम की कल्पना करते हैं तो वे इन कथाओं के पात्रों के कालक्रम की कल्पना करने लगते है यद्यपि इनमें वर्णित घटनओं में बहुत कुछ तो लेखक के काल का होता है, उसके अपने अनुभवों, अध्ययन और कल्पना पर आधारित होता है।

अगर हम इन पुराण कथाओ में वर्णित घटनाओं को विज्ञान मान भी लेते हैं तो भी ये पुराण कथायें विज्ञान कथाओं की श्रेणी में नहीं आतीं हैं क्योंकि इनमें तथाकथित विज्ञान फंतासियों को मात्र उद्धृत किया गया है उनके बारे में सिलसिलेवार घटनाक्रम और उन के तथ्यों की पूरी विवेचनाओं का तो पूर्णत: आभाव है। मतलब ये किसी भी दृष्टिकोण से पुराण कथाओं को विज्ञान कथाओं की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। हां कुछ अभी भी कुछ विज्ञान कथा मनीषी इन्हे पृच्छन्न विज्ञान कथायें मानते हैं।(2)

इस विषय विज्ञान कथा मनीषियों के बीच 'याहू के इंडियन सांइन्स फिक्शन ग्रुप' पर एक लम्बी पर बेनतीजा बहस हो चुकी है (6)। हालांकि मेरा मानना है कि अभी भी इस विषय पर गम्भीर रूप से सोचने की गुंजायश है पर यहाँ इसे ज्यादा तूल देकर मैं एक और अनिर्णित बहस की शुरुआत नहीं करना चाहता।
इस तरह पुराणों वेदों और धार्मिक पुस्तकों में पहली विज्ञान कथा खोजने की मेरी ये कोशिश एक बार फिर नाकाम रही।

कौन सी है भारत की पहली विज्ञान कथा?
लगता है मैं मूल बिन्दु से भटक गया हूं। तो आते है मूल बात पर। विज्ञान कथा के मर्मज्ञ एक बात पर निर्विवाद रूप से सहमत हैं कि भारत की पहली विज्ञान कथा बांग्ला में लिखी गई थी वह भी प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु द्वारा, सन् 1897 में। अन्य भाषाओं की पहली विज्ञान कथायें तो बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ की हैं। यहां मै इस बात से तो सहमत हूं कि भारत की पहली विज्ञान कथा बांग्ला में लिखी गई थी (3) (4) (7) पर ये सर जगदीश चन्द्र बसु द्वारा लिखित 'पोलातोक तूफान' नहीं थी। आइये एक-एक कर के इनके बारे में चर्चा करते हैं।

पोलातोक तूफान
आम मान्यता है कि सन् 1896 में लिखी गई वैज्ञानिक सर जगदीश चन्द्र बोस की कहानी 'पोलातोक तूफान', भारत की पहली विज्ञान कथा है। ये कहानी पहले उन्होने 'निरुद्देशेर कहानी' के नाम से लिखी थी पर बाद में इसे 'ओबाक्तो' में प्रकाशन हेतु भेजते समय इसका नाम बदल कर 'पोलातोक तूफान' कर दिया था। इसमें सिर में डालने की छोटी सी तेल की शीशी (कुन्तोल केशोरी) से तूफान को भगाने की कथा है। निश्चित रुप से प्रख्यात वैज्ञानिक सर जगदीश चन्द्र बोस द्वारा लिखित इस कहानी के विज्ञान कथा होने पर किसी को भी संदेह नहीं होना चाहिये पर क्या यही भारत की पहली विज्ञान कथा है यही विचारणीय प्रश्न है।

शुक्र भ्रमन
प्रख्यात बांग्ला विज्ञान लेखक और शांति निकेतन में अध्यापक श्री जगदानंद राय ने इस विज्ञान कथा को लिखा तो सन् 1857 में था पर किन्हीं कारणों से इसे प्रकाशित होने में 22 वर्ष लग गये और ये प्रकाशित हुई सन् 1879 में। इसमें शुक्र ग्रह तक की अन्तरग्रहीय यात्रा का वर्णन है साथ ही इसमें अन्य ग्रह (यूरेनस) में रहने वाले एलियंस का वर्णन है जिनका विवरण श्री जगदानंद राय ने कुछ इस प्रकार से दिया है-

'वे देखने में हमारे यहॉ के कपियों जैसे थे, उनका पूरा शरीर घने, लम्बे और काले बालों से ढ़ंका था। उनके सिर उनके शरीर की तुलना में काफी बड़े थे। उनकी उंगलियों में बड़े नाखून थे और वे पूरी तरह नंगे थे।(5)'

भारतीय विज्ञान कथा के इतिहासकारों या यूं कहिये कि विश्व विज्ञान कथा के इतिहासकारों के लिये इस कहानी का बड़ा महत्व है। एक तो इसमें एलियंस का विवरण देते समय मानव के विकास के वैज्ञानिक सिद्धान्त का पूरा ध्यान रखा गया है कि मानव कपियों से विकसित हुये हैं। दूसरे इसमें अन्तरग्रहीय यात्रा का वर्णन है जो किसी पाश्चात्य लेखक की विज्ञान कथा से प्रभावित नहीं है। एच0 जी0 वेल्स की विज्ञान कथा 'वार ऑफ द वर्ल्ड' जिसे अन्तरग्रहीय यात्राओ का प्रणेता माना जाता है, से श्री जगदानंद राय की ये विज्ञान कथा से 19 वर्ष पहले छपी थी (41 वर्ष पहले लिखी गई थी)। ये किसी भी मारतीय के लिये सहज ही गर्व का विषय हो सकता है।

रोहोस्सो (रहस्य) हेमलाल दत्ता द्वारा दो भागों में लिखी गई ये विज्ञान कथा श्री जोगेन्द्र साधु द्वारा प्रकशित बांग्ला विज्ञान पत्रिका 'विज्ञान दोर्पोन' (विज्ञान दर्पण) में 1882 में छपी थी। इसमें नगेन्द्र नाम का एक व्यक्ति अपने मित्र के घर जाता है। इस कहानी में वर्णित उस मित्र के घर में सारी चीजें स्वचालित हैं जैसे कि किसी व्यक्ति के दरवाजे पर आ जाने पर दरवाजे की घंटी का अपने आप बज उठना, कपड़ा साफ करने के ऐसे स्वचालित ब्रुश जो आवश्यकता पड़ने पर सूट को अपने आप साफ कर देते हैं। पर इस कथा में मानव समाज में उस समय विकसित हो रहे ऑटोमेटेशन पर आश्चर्य का पुट ज्यादा है और वैज्ञानिक सोच कम, इसलिये कुछ विद्वान इसे एक सच्ची विज्ञान कथा मानने में हिचकिचाते हैं।

यद्यपि उपरोक्त लेखकद्वय (हेमलाल दत्ता और श्री जगदानंद राय) की इन दो विज्ञान कथाओं की मूल या अनूदित प्रतियों को देखने और पढ़ने का सौभाग्य तो मुझे और मेरे जैसे बहुत से विज्ञान कथा शोधार्थियों को नहीं मिल पाया है और मेरा ये अभिमत यत्र-तत्र से अर्जित उद्धरणों और जानकारी पर आधारित है इसलिये इसकी सत्यता की पूरी परख तो तभी हो सकेगी जब इन विज्ञान कथाओं की मूल व अनूदित प्रतियां उपलब्ध हो सकें। यदि कोई विज्ञान कथा मनीशी या शोधार्थी उपरोक्त विज्ञान कथाओं की मूल व अनूदित प्रतियां उपलब्ध करा सकें तो इससे  भारतीय विज्ञान कथा साहित्य का काफी हित होगा इसमें संदेह नहीं है।

चलते चलते एक बात और स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि भारत की पहली विज्ञान कथा के बारे में मेरा ये मत न तो मेरा आग्रह है और न इसके अन्तिम होने का दावा। क्योंकि विज्ञान से जुड़े विषयों में आगे अनुसंधान और फेर-बदल की संभावनायें हमेशा बनी रहती है जो इसमें भी हैं। इस विषय पर विज्ञान कथा के मनिषयों के बहुमूल्य विचारों का स्वागत है लेकिन तब तक तो आम मान्यता के विपरीत श्री जगदानंद राय की विज्ञान कथा 'शुक्र भ्रमन' को ही भारत की पहली विज्ञान कथा कहना उचित होगा।

सन्दर्भ
1. Indian science fiction -- past and present  (http://www.boingboing.net/2007/11/30/indian-science-ficti.html)
2- डा0 राजीव रंजन उपाध्याय: `भविष्य दशZन के सोपान´ (आधुनिक ययाति), प्रकाशक- ग्रन्थ विकास, जयपुर।
3. Bengali science fiction (http://en.wikipedia.org/wiki/Bengali_science_fiction)
4. Sadhanbabu’s Friends: Science fiction in Bengal from 1882 – 1961 By- Debjani Sengupta
5. Jagadananda Roy (http://en.wikipedia.org/wiki/Jagadananda_Roy)
6. http://in.groups.yahoo.com/group/indiansciencefiction/ 
7. बीसवीं शती का विज्ञान विश्वकोश-1. भारतीय विज्ञान कथायें-- ले0 शुकदेव प्रसाद।



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by Dr. Radut.