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जीवन की संरचना - बिल ब्रायसन

सजीव कोशिका जीवन की इकाई होती है तथा इसका अन्तर्निहित पदार्थ जीवन का भौतिक आधार हुआ करता है। कोशिका एक जटिल तंत्र (system) होता है । ‘सूक्ष्म में विराट के

दर्शन’ का स्मरण हो आता है, जब हम जीवित कोशिका में झाँकना तय करते हैं । हम शायद इसे अपने आस-पास के बहुत सारे विम्बों के सहारे समझ सकते हैं, शायद जैसे अर्जुन ने कृष्ण के विराट स्वरूप को समझा होगा ।

पौधे के तने के एक ऐसे खण्ड में, जो 1 मि.मि लम्बा, 1मि.मि.चौड़ा और 1मि.मि. मोटा हो, कोशिकाओं की संख्या अनुमानतः एक करोड़ होती है । इससे औसत कोशा के विस्तार का अनुमान लगाया जा सकता है । इन एक करोड़ कोशिकाओं में से प्रत्येक की संरचना और संगठन अत्यन्त जटिल होते है। प्रत्येक कोशिका के जटिल एवम् गतिशील सायटोप्लाज़्म में अनेकों माइटोकॉण्ड्रिया, गॉल्गी बॉड़ीज आदि रचनाओं के साथ एक नाभिक स्थित होता है। नाभिक में क्रोमोज़ोम्स होते हैं. क्रोमोजोम्स जीन्स के वाहक होते हैं। ये सब आपस में सम्प्रेषणीयता कायम किये रहते हैं तथा इनमें पारस्परिक निर्भरशीलता होती है - जेल(gel) और सॉल(sol) प्रावस्थाओं में लययुक्त आवर्ती परिवर्तन ---- इन सबके अनोखे विन्यास और अवस्थिति तथा परत-दर-परत संगठन वाले न्यूक्लियोप्रोटिन अणु ---- बस चकित ही कर देते हैं ।

“अगर हम कोशिका के अन्दर का भ्रमण कर पाएँ तो कदाचित हमें वह बिलकुल अच्छा न लगे ।
अगर हम एक परमाणु को मटर के दाने के बराबर होने की कल्पना करें तो एक कोशा करीब आधा मील व्यास के गोले की तरह दिखेगी, जो शहतीर के जटिल ढाँचे --- सायटोस्केलिटन(cytoskeleton)--- द्वारा सम्भला हुआ होता है । इसके अन्दर लाखों, करोड़ों वस्तुएँ--- कुछ बास्केटबॉल की माप की, कुछ दूसरी,कारों की माप की --- गोलियों की तरह छूटती रहती होंगी । एक भी ऐसी जगह नहीं होगी जहाँ कोई हर दिशा से हर क्षण बिना मुकियाए गए या चोट खाए गए खड़ा रह सके । रसायनों और दूसरे कारकों द्वारा,जो इसपर चोट करते रहते हैं या बेपरवाही से इसको चीरा करते हैं--- डी.एन. ए. के हर सूत्र पर, औसतन हर 8.4 सेकण्ड में— एक दिन में 10,000 बार – आक्रमण होता रहता है । हर चोट तत्क्षणात् भर जाया करती है, अन्यथा कोशिका का विनाश अवश्यम्भावी होता।”
( पुनर्रचनाकार - डा.गंगानंद झा)

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by Dr. Radut.