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विज्ञान कथा एवं विज्ञान-फिल्मों में विज्ञान के संंपुट की आवश्यकता

विज्ञान कथाओं की, फिल्मों की, चर्चा करते समय पाठक के अन्त:करण में, मानस में यह भावना विद्यमान रहती है कि अवश्य ही इसके विवरण में, चित्रण में, निरूपण में, विज्ञान का संपुट कहीं न कहीं निश्चय ही होगा। इस प्रकार का विचार तर्क संगत भी है और महत्वपूर्ण भी।

तर्क संगत इस कारण कि विज्ञान कथा-विज्ञान विहीन होने की कल्पना कर पाना कठिन है और महत्वपूर्ण इस दृष्टि से है कि यदि विज्ञान, कथा में है ही नहीं तो क्या यह मात्र एक कथा है? इस कारण एक विज्ञान कथा लेखक का दोहरा दायित्व होता है कि वह कथा में विज्ञान के तर्क युक्त पक्ष को, शोध को, शोध परिणामों को तथा प्रौद्योगिकी जन्य भविष्योन्मुखी सभावनाओं के चित्रणों को कथा शिल्प के साथ संयुक्त कर, रोचक, मनोग्राही कथा की रचना करे। छद्म विज्ञान, स्मूडो साइंस की उपस्थिति पाठक को भ्रमित ही नहीं करती, वरन यह विज्ञान के जनमानस में, उचित रूप से संचार में व्यवधान भी उत्पन्न कर देती है।

इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुये लब्ध प्रतिष्ठित विज्ञान कथाकर जूल्सबर्न, क्लार्क, आसिमोव, रार्वट हाइन लाइन माइकेल क्रिकटेन आदि ने विज्ञान के पक्ष को कथा में सदैव प्रतिष्ठित किया। इसी प्रकार मैंने सदैव विज्ञान सम्पन्न, विज्ञान तथ्य, एवं तर्क युक्त, विज्ञान कथा लिखने पर बल दिया।

परन्तु सिनेमा जगत अर्थ का अनर्थ, कर अर्थ साधना में प्रवीण होता है। इसी हेतु वह अधिकांश फिल्मों में विज्ञान की भाँति लगने लगने वाले दृश्यों को प्रस्तुत कर, काम चलाने के पक्ष में रहता है। उदाहरण के लिए आप भारतीय हिन्दी सिनेमा की विज्ञान नाम धारणी फिल्मों को गम्भीरता से निरखिये। आप को इनमें कितने प्रतिशत विज्ञान मिलेगा-आप स्वयं इसका आकलन कर सकते हैं, तथा वे कितनी विज्ञान सम्मत है, इसका भी निर्णय आप स्वत: कर सकते हैं।

येन केन प्रकारेण अर्थोपार्जन की व्याधि बालीवुड से अधिक हालीवुड में है, इसी कारण दो बार प्रतिष्ठत आस्कर पुरस्कार से सम्मानित, रसायनज्ञ और अभिनेता डस्टिन हाफमैन को यह कहने के लिए बाध्य होना पड़ा कि हालीवुड़ के द्वारा प्रदर्शित फिल्मों में सही रूप से, उचित ढंग और मात्रा में विज्ञान के तथ्यों का समावेश होना चाहिए जिससे हालीवुड़ निर्मित विज्ञान-फिल्मों, साई फिल्मों की, विज्ञान-सिद्धान्तों पर आधारित गुणवत्ता में कमी खटकने वाली प्रतीत न हो। इस हेतु अमेरिका के नेशनल एकाडेमी आफ साइसेंज के संबद्ध वैज्ञानिकों ने भी फिल्म निर्देशकों को साई-फिल्मों के निर्माण हेतु विज्ञान तथ्य मय जानकारी देने पर सहमति प्रकट की है, जिससे कि ``जुरासक पार्क,´´ ``आउट-ब्रेक´´ ``स्फेयर´´ की भाँति फिल्मों का निमार्ण अधिकता से हो सके।

श्री हाफमैन ने `द कोर´ नामक साइ-फिल्म जिसमें एक व्यक्ति अपने यान के माध्यम से पृथ्वी के गर्भ में, पृथ्वी की धुरी को, एक्सिस को ठीक करने हेतु चला जाता है, की अवैज्ञानिकता पर टिप्पणी करते हुए उपर्युक्त विचार व्यक्त किए थे।

आशा है भविष्य में, भारत में, विशेषकर बालीवुड के साई-फिल्म निर्माता भी वैज्ञानिकों का मार्ग दर्शन सहयोग लेकर यदि हिन्दी साई-फिल्मों का निर्माण प्रारम्भ करते हैं तो यह विज्ञान संदेश संचार एवं मनोरंजन की दिशा में सराहनीय प्रयास माना जायेगा।

डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय
(सम्पादक विज्ञान)
हिंदी विज्ञान पत्रिका 'विज्ञान' मे पूर्व प्रकाशित



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