वाद

प्रतिवाद :- "यहाँ‌ शोध मे बहु-पत्नियों का जिक तो खैर नही किया गया है इस लिये उस पर कोई टिप्प्णी नहीं। अब आते है तार्किक्ता पर। खेतिहर पुरूष और शिकारी तथा घूमन्तू पुरूष मे समसे बडा अंतर है स्थायित्व। जहाँ घुमन्तु पुरूष...

प्रतिवाद

इससे पूर्व की हम बात आगे बढायें, आपको इस नये स्तंभ की थोडी जानकारी दे दें। हम रचनायें प्रकाशित करते हैं‌, उन्हे पढते हैं लेकिन उनका समालोचनात्मक विश्लेषण नही होता है। ब्लागिगं जगत की तू मेरी पीठ खुजा मै तेरी प्रवत्ति कल्किआन मे वर्जित है। इसीलिय...

यूनिवर्स - एक इण्टेलिजेंट डिजाइन

जबसे इस धरती पर मानव ने होश संभाला है, हमेशा आसपास की वस्तुओं ने उसके अन्दर जिज्ञासा जागृत की है। प्रकृति के अनसुलझे प्रश्नों को उसने सुलझाने का प्रयास किया है। जो सवाल उसके मन में सर्वाधिक बार उठा वह यह था कि इस सृष्टि की रचना किसने की? या ये सृष्टि अपने आप बनी?



इस बारे में सर्वाधिक मान्य धारणा है ईश्वर गॉड या खुदा की। दूसरी मान्यता यह है कि सृष्टि में सब कुछ स्वयं निर्मित है। साइंस फिक्शन भी इस बारे में मौन नहीं हैं। कुछ कल्पनाओं के अनुसार धरती पर सब कुछ निर्मित हुआ है कुछ एलियेंस द्वारा। और ये एलियेन्स स्वयं किसी अन्य बुद्धिमान रचनाकर्ता द्वारा निर्मित हुए हैं। तो इस तरह जो कुछ भी है सब एक इण्टेलिजेंट डिजाइन का एक हिस्सा है। एक अन्य कल्पना के अनुसार यूनिवर्स खुद एक बुद्धिमान रचना है और उसने अपने अन्दर सब कुछ स्वयं निर्मित किया है।

लेकिन इस ब्लाग में इस सवाल से दूर रहते हुए कि यूनिवर्स का निर्माण किसने किया या कैसे हुआ? हम इस सवाल का जवाब ढूंढेंगे कि यूनिवर्स एक इण्टेलिजेंट डिजाइन है या नहीं? इस अध्ययन के लिए बहुत लंबे चौड़े ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। एक हाईस्कूल लेवेल की किताबों में मौजूद ज्ञान ही मेरी समझसे काफी है।

अपने अध्ययन की शुरुआत करते हैं हर पदार्थ के बिल्डिंग ब्लाक यानि एटम से।

हमारी दुनिया तरह तरह के लोगों और चीज़ों से भरी पड़ी है। कहीं हरियाली, पेड़ पौधे, तो कहीं रेत से भरे रेगिस्तान। कहीं समुन्द्र तो कहीं पहाड़। कहीं इंसान तो कहीं हैवान। कहीं जानदार तो कहीं बेजान। लेकिन एक बात तय है कि इनको बनाने वाला मैटर एक ही है। कैसे?
यह वह राज़ है जिसको इनसान ने हजारों सालों की गौरो फिक्र व एक्सपेरिमेंट के जरिये डिस्कवर किया। वह राज़ है हॉरमनी का। एक होने का। यानि इस दुनिया में जो कुछ भी है सब का बेसिक स्ट्रक्चर एक है। इंसान से लेकर बैक्टीरिया तक, सितारों से लेकर ज़मीन की गहराईयों तक हर जगह वही स्ट्रक्चर दिखाई देता है।

और यह स्ट्रक्चर है एटम का।

जानने की कोशिश करते हैं कि एटम क्या है?

एक काग़ज़ का टुकड़ा लीजिए और उसके छोटे छोटे पीस कर दीजिए। फिर उसके और टुकड़े कीजिए। धीरे धीरे पीस इतना छोटा हो जायेगा कि आँखों से दिखाई देना बन्द हो जायेगा। लेकिन उसके बावजूद उसके और छोटे टुकड़े किये जा सकते हैं। आखिर में आपको वह टुकड़ा मिलेगा कि उसे और छोटे टुकड़ों में तोड़ना मुमकिन न होगा।

इस सबसे छोटे टुकड़े में कुछ गोल गेंद की तरह के शेप एक दूसरे से जुड़े दिखाई देंगे। यही शेप एटम हैं। हर तरह के मैटर को यही एटम एक दूसरे से जुड़कर बनाते हैं।

एटम, जो किसी भी मैटर का सबसे छोटा जर्रा होता है। इतना बारीक कि एक पिन की नोक पर दस करोड़ से ज्यादा एटम समा सकते हैं। लेकिन यही एटम अपने अंदर हज़ारों करिश्मे समेटे हुए हैं। हर रोज़ इंसान इसके किसी न किसी नये करिश्मे से रूबरू हो रहा है। जो यकीनन इशारा है इस बात का कि यह किसी बहुत ही इण्टेलिजेंट डिजाइन का एक हिस्सा है।

एक छोटा सा एटम अपने में एक पूरी दुनिया को समेटे है? यानि हमारी दुनिया के इस सबसे बारीक ज़र्रे में एक शहर से भी ज्यादा हलचल लगातार होती रहती है। लेकिन इस हलचल के बावजूद न तो एटम टूटकर बिखरने पाता है और न ही सिमटकर और छोटा होने पाता है। एक पूरा माइक्रो यूनिवर्स एटम में मौजूद है। जहाँ निगेटिव चार्ज इलेक्ट्रान केन्द्रीय हिस्से न्यूक्लियस के चारों तरफ तेजी से चक्कर लगाते रहते हैं। इलेक्ट्रान की ये स्पीड बहुत ज्यादा होती है। यानि लगभग रौशनी की स्पीड के बराबर। रौशनी जो एक सेकंड में तीन लाख किलोमीटर का सफर तय कर लेती है? यानि जमीन से चाँद तक पहुंचने में उसे लगते हैं डेढ़ सेकंड जबकि चाँद ज़मीन से साढ़े चार लाख किलोमीटर दूर है।

क्या ये हैरत की बात नहीं कि इतनी हाई स्पीड इलेक्ट्रान लगातार कायम रखता है? और न सिर्फ कायम रखता है बल्कि इतनी ही रफ्तार से घूमते हुए दूसरे इलेक्ट्रानों से टकराता भी नहीं। जबकि दूसरे इलेक्ट्रान उससे बस कुछ ही कदम दूर होते हैं।

सर्कस का एक खेल होता है, जिसका नाम है मौत का कुआँ। इस गेम में एक या दो मोटरसाइकिल सवार तेज रफ्तार के साथ गोल घेरे में चक्कर लगाते हैं। ज़रा सोचिए अगर वहीं पर दस पन्द्रह मोटरसाइकिलें सौ किलोमीटर फी घण्टा की रफ्तार से दौड़ानी हैं। और इसके लिए सिर्फ एक पूरा दिन रख दिया जाये तो यकीनन उनमें से चन्द मोटरसाइकिलें ज़रूर टकरा जायेंगी। लेकिन एटम में पचासों इलेक्ट्रान मोटरसाइकिल से लाखों गुना तेज़ रफ्तार से लगातार दौड़ते रहते हैं और ज़मीन पर मौजूद अरबों एटम में से एक में भी ऐसा कभी नहीं होता कि कोई एक्सीडेन्ट हो जाये।

जो इस बात का सुबूत है कि सृष्टि का जन्म एक्सीडेन्टल नहीं है बल्कि यह एक इण्टेलिजेंट डिज़ाइन है। वह डिजाइन जिसमें कहीं कोई कमी नहीं। 

अब सवाल पैदा होता है कि वह कौन सी ताकत है जो इलेक्ट्रानों को न्यूक्लियस के चारों तरफ हरकत में रखती है? इस ताकत को वैज्ञानिकों ने नाम दिया है इलेक्ट्रोस्टेटिक फोर्स। यानि बिजली की ताकत। क्या है यह बिजली की ताकत?
सर्दियों में ऊनी कपड़े उतारते वक्त अक्सर जिस्म से चिंगारी निकलती है। साथ ही कपड़े को उतारते वक्त हल्की ताकत भी लगानी होती है। यही है बिजली की ताकत की झलक। जिस्म की रगड़ खाकर कपड़ों में इलेक्ट्रिक चार्ज पैदा होता है, जिससे पैदा होती है बिजली की ताकत।

तो यही ताकत इलेक्ट्रानों को न्यूक्लियस के चारों तरफ गर्दिश कराती रहती है। कैसे? दरअसल जिस तरंह इलेक्ट्रान पर निगेटिव चार्ज होता है उसी तरह न्यूक्लियस में एक पार्टिकिल प्रोटॉन पाया जाता है। और उसपर पाजिटिव चार्ज होता है। इन दोनों के बीच बिजली की ताकत कशिश की होती है। जिससे दोनों यानि इलेक्ट्रान और प्रोटॉन एक दूसरे को खींचते हैं।

यूनिवर्स ---

आलेख में ठीक ही कहा है, (इसी डिज़ाइन को वेदिक साहित्य में-”यत्पिन्डे तत ब्रह्मांडे’ व ’अणो अणीयान, महतो महीया” कहा है ) " कि सृष्टि का जन्म एक्सीडेन्टल नहीं है बल्कि यह एक इण्टेलिजेंट डिज़ाइन है। वह डिजाइन जिसमें कहीं कोई कमी नहीं।" तथा- "अब सवाल पैदा होता है कि वह कौन सी ताकत है जो इलेक्ट्रानों को न्यूक्लियस के चारों तरफ हरकत में रखती है? इस ताकत को वैज्ञानिकों ने नाम दिया है इलेक्ट्रोस्टेटिक फोर्स। यानि बिजली की ताकत। क्या है यह बिजली की ताकत?"" --- बिल्कुल ठीक है,यह एक इन्टेलिजेन्ट- डिजायन है--मूल प्रश्न तो यह उठता है कि---वह इन्ट्लीजेन्ट कौन है? व यह इलेक्ट्रोस्टेटिक फ़ोर्स, कहां से आई, किसने उत्पन्नन की? स्वयं एलेक्ट्रोन-प्रोटोन कैसे बने? --- इसका ही उत्तर विज्ञान ने -डा स्टीफ़न डब्ल्यु हाकिन्स की पुस्तक-" ओरिजिन अन्ड फ़ेटे ओफ़ यूनिवर्स में बिग बेन्ग से तथा वेदों मे ब्रह्म की इच्छा ’ एकोहम बहुस्याम’ से दिया है; जो मैंने--कल्किआन हिन्दी पर अपने प्रलेख-- ’सृष्टि व ब्रह्मांड’. में ४ भागों में विस्त्रत रूप में लिखा है.

"जहां तक ब्रह्माण्ड की बात

"जहां तक ब्रह्माण्ड की बात है, कैसे कहा जा सकता है की पिंड भटक रहे हैं या किसी ख़ास पाथ पर चल रहे हैं?" विज्ञान का एक निय़म है: "सिम्पल एक्स्प्लेनेशन इस द राईट एक्सप्लेनेशन"। खास पथ कैसे बनता है? आप रोज किसी ने किसी उल्का की खबर सुनते रहते हैं। सामान्य सा नियम है कि पिण्ड तारो के गुरूत्त्वा कर्षण मे फंस कर बटक जाते हैं। और पथ भर्मित हो जाते हैं। ब्लैक होल को तो अब वैज्ञानिक पिछ्ले दो दशको से देखते आ रहे हैं। यह पुरानी धारणा है कि ब्लैक होल अदृश्य होता है। ब्लैक होले से भी विकीरण उत्सर्जित होता है। आकाशगंगा की ओवरलैपिंग नही होती -- कल्पना करे खरबो तारो से भरी दो आकाश गंगाये एके दूसरे की तरफ बढे तो इसे ओवरलैपिंग कहा जायेगा? करोडो नक्षत्र एक दूसरे से टकरा कर न्ष्ट होगे। टकराते ग्रह -- और ज्यादा दूर जाने की बात नही है। आप कल्किआन के समाचार देख लें वे लोग तो ऐसी खबरे जब तब छापते ही रहते हैं। कुछ लिण्क यह रहे। क्षमा करें मै खगोल का विद्यार्थी हूँ‌ अत: चर्चा कर रहा हूँ।आशा है आप अन्यता न लेंगे। ब्लैक होल:‌http://kalkion.com/news/black-hole-caught-zapping-galaxy-existence/750 टकराते ग्रह: http://www.kalkion.com/news/nasa-saw-collision-two-planets/452 ब्लैक होल: http://kalkion.com/news/first-black-holes-were-diet/456

अजय साहब, आप मेरे लेख में

अजय साहब, आप मेरे लेख में इंटरेस्ट ले रहे हैं, इसके लिए बहुत बहुत शुक्रिया. ये मेरे लेख की पहली कड़ी है जिसमें मैंने एटम की बात की है. आगे ब्लैक होल्स और ग्रहों की भी बात होगी उस समय इन चीज़ों के बारे में विस्तार से चर्चा होगी. अगर एटम के बारे में मेरी इस पोस्ट में कोई शंका हो तो डिस्कस कर सकते हैं.

ईटेलिजेट डिजाईन?

"सर्कस का एक खेल होता है, जिसका नाम है मौत का कुआँ। इस गेम में एक या दो मोटरसाइकिल सवार तेज रफ्तार के साथ गोल घेरे में चक्कर लगाते हैं। ज़रा सोचिए अगर वहीं पर दस पन्द्रह मोटरसाइकिलें सौ किलोमीटर फी घण्टा की रफ्तार से दौड़ानी हैं। और इसके लिए सिर्फ एक पूरा दिन रख दिया जाये तो यकीनन उनमें से चन्द मोटरसाइकिलें ज़रूर टकरा जायेंगी। लेकिन एटम में पचासों इलेक्ट्रान मोटरसाइकिल से लाखों गुना तेज़ रफ्तार से लगातार दौड़ते रहते हैं और ज़मीन पर मौजूद अरबों एटम में से एक में भी ऐसा कभी नहीं होता कि कोई एक्सीडेन्ट हो जाये।" ब्रहाण्ड भी तो ऐसे ही बना है। जो टकराने के बाद बच गये वही चक्कर लगाते रह गये। ज्यादा दूर जाने की जरूरत नही है। सौर मंण्डल इसका उदाहरण है। टकराव, उल्टेसिधे च्क्कर के बाद जो सामग्री बची वही सौर मंणडल बन गयी। भूकंप, उल्कापिड, धूमकेतू, भटकते ब्लैक होल, आपस मे टकराती आकाश गंगायें, टकराते ग्रह -- यह सब भी तो हो रहा है अंतरिक्ष मे! हो रहा है न? क्या उस पर प्रकाश डालेंगे जीशान? यहाँ तो सब कुछ 'बाई एक्सीडेन्ट' वाला मामला है न की ईटेलिजेट डिजाईन। खामिया ही खामिया हैं इस डिजाईन मे। मुद्धे और भी हैं फिर कभी।

अजय जी, जहां तक ब्रह्माण्ड की

अजय जी, जहां तक ब्रह्माण्ड की बात है, कैसे कहा जा सकता है की पिंड भटक रहे हैं या किसी ख़ास पाथ पर चल रहे हैं? आपने कहा भटकते ब्लैक होल, लेकिन ब्लैक होल को तो अभी देखा ही नहीं गया है. आकाशगंगाओं की ओवरलैपिंग को टकराना कहा जा सकता है? और ये भी नहीं मालूम की वो ओवरलैपिंग है या हमारी नज़रों का धोखा. आप बताएं की हमारे या किस सौरमंडल में ग्रह एक दूसरे से टकरा रहे हैं. वैसे सभी पिंड एक नियम का ज़रूर पालन कर रहे हैं, वह है जन्म-विकास-और फिर-मृत्यु