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क्यों सिर्फ दौलू है, हिन्दी विज्ञान कथा लेखक?

गॉवों में एक कहावत प्रचलित है, "माया तेरे तीन नाम, दौलू, दौलत, दौलत राम", यानि कि किसी के स्टेट्स के साथ उसका नाम भी बदलता जाता है। आज हिन्दी विज्ञान कथा के लेखकों पर विचार करते समय अनायास ही ये बात मुझे याद आई। आप किसी साहित्यिक गोष्ठि में हिन्दी विज्ञान कथा के बारे में बात करके देख लीजिये, इसकी शान में कसीदे पढ़े जाने लगेंगे, इसे हिन्दी साहित्य का अति महत्वूर्ण तत्व, अनुपम विधा, और न जाने क्या-क्या कहा जाने लगेगा। ऐसे में उत्साहित होकर कहीं आपने हिन्दी विज्ञान कथा लेखकों की बात छेड़ दी तो परिदृश्य एकदम बदल जायेगा, सबके उत्साह पर पानी फिर जायेगा।

हिन्दी विज्ञान कथाकार भी क्या कोई साहित्यकार है...अनाप-शनाप...ऊल-जलूल लिखने वाला, उसे कैसे साहित्यकार की श्रेणी में रखा सकता है अरे साहित्य लिखने के लिये संवदेना चाहिये होती है.... शिल्प और भाषा का ध्यान रखना होता है, ये सब हिन्दी विज्ञान कथाकार में कहॉ? कुल मिलाकार आज हिन्दी विज्ञान कथा लेखक की दशा अन्य साहित्यकारों के बीच उस विपन्न सजातीय जैसी है जो गिनती में तो आता है पर उसे औरों के साथ आसन पर बैठने की अनुमति नहीं है। साहित्यकारों के समाज में वह न '`दौलत राम' है, न 'दौलत' वह सिर्फ 'दौलू' है, '`दौलू'। आखिर क्यों है ऐसा?

सुनियोजित साहित्यिक षडयंत्र
एक जमाना था कि जब सारा का सारा साहित्य बड़े विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागों से ही उपजता था। ऐसे स्थानों में हिन्दी का एक प्रोफेसर हिन्दी का साहित्यकार तो होगा ही, ऐसा मान लिया जाता था। वक्त के साथ हिन्दी साहित्य के इन मठों में ऐसे स्वयंभू मठाधीश उत्पन्न हो गये थे जो यह तक निर्धारित करने लगे थे कि किसको साहित्यकार बनाना है, किसको नहीं, किसकी कथा को मील का पत्थर मनवाना है, किसको धूल चटाना है। जिसको हमने साहित्यकार नहीं माना वह भला साहित्यकार कैसे हो सकता है? उनकी ये सल्तनत कई पीढियों तक चली। शुक्र है कि ये सामंती परिपाटी अब खत्म होती नजर आती है हालॉकि मूल साहित्य में अभी भी इस परम्परा के ध्वजवाहक एक बनारसी युवराज अभी भी यदा-कदा अपनी इस सामंती पृवत्ति का उद्घोश करते नजर आ ही जाते हैं।

विज्ञान लेखक एक दुरुह विषय है उस पर विज्ञान पर आधारित कथा साहित्य लेखन तो दुरूहतम था। इसलिये डा. सम्पूर्णानन्द, आचार्य चतुर सेन शास्त्री, राहुल सांस्कृतायन जैसे कुछ गिने चुने प्रतिष्ठित लेखकों और कुछ सिद्धहस्त साहित्यकारों को छोड़ कर ज्यादातर साहित्यकारों ने इस क्षेत्र में हाथ ही नहीं आजमाया। अब बताइये जो विज्ञान कथा लेखन विज्ञान कथा के इन स्वानामधन्य, तथाकथित खानदानी साहित्यकारों के कर कमलों द्वारा हो ही नहीं रहा था वह भला साहित्य कैसे हो सकता था?

जब कुछ लोगों (विज्ञान कथा लेखकों) ने विज्ञान के क्षेत्र में ही दिन-प्रतिदिन हो रही क्रांति को ही साहित्य का विषय बनाया तो उन्होंने इसे साहित्यिक घुसपैठ, अनाधिकार चेष्ठा या साहित्यिक प्रदूषण करार दिया। लिखने वालों को रोकने का बूता तो उनमें था ही नहीं इसलिये उन्होंने इस विज्ञान कथा साहित्य को सुनियोजित तरीके से साहित्य मानने से ही इंकार कर दिया फिर इनका लेखक साहित्यकार कैसे माना जाता?

इधर विज्ञान कथा लेखक भी अपने को साहित्यकार मनवाने पर तुल गये (जो वस्तुत वह हैं भी)। ये रस्साकशी कहीं गुपचुप तरीके से तो कहीं प्रकटत: अभी भी चली आ रही है। खुशी है कि ये साहित्यक सामंतवाद अब शिथिल पड़ने लगा है और विज्ञान कथा को सैद्धान्तिक रूप से (खुशी-खुशी बाहें फैला कर नहीं) उसका उचित स्थान मिलने लगा है। एक दिन जरूर आयेगा जब विज्ञान कथाकार को सीधे-सीधे साहित्यकार माना जायेगा और  विज्ञान कथाकार होना उसकी 'विशिष्ठ साहित्यक उत्कृष्टा'  मानी जायेगी।

क्या सचमुच विज्ञान कथा आम पाठक की कथा नहीं है?
कुछ लोगों का मत है कि ऐसा होना अवश्यंभावी है। मानव जीवन में कहां नहीं है विज्ञान? अगर आम जीवन में प्रयोग होने वाले इस विज्ञान को विज्ञान कथा का हिस्सा बनाया गया तो क्या वह सचमुच में विज्ञान कथा?  मेरा मत इसके विपरीत है। आम लोगों के बीच रोजमर्रा के जीवन में काम आ रही वैज्ञानिक जानकारी या फिर आम आदमी को बीच सहजता से उलब्ध वैज्ञानिक जानकारी को अगर विज्ञान कथा का हिस्सा बनाया जा सके तो ऐसी विज्ञान कथा की पैठ आम आदमी तक भी होगी, उस आदमी तक भी जिसको नियोजित तरह से विज्ञान की शिक्षा भी नहीं मिली है, जिसको विज्ञान का क ख ग भी पता नहीं है। मेरे मत में ऐसी विज्ञान कथा ही सफलतम विज्ञान कथा होगी।

क्या ऐसी विज्ञान कथायें लिखी जा सकतीं है? क्यों नहीं, उदाहरण के तौर पर डा0 अरविन्द मिश्र के विज्ञान कथा संकलन "एक और कौंच वध" में संकलित कहानी "अंतरिक्ष कोकिला" या शुकदेव प्रसाद की बाल बाटिका के जनवरी 2005 अंक में प्रकाशित "किम आश्चर्यम्" ली जा सकतीं हैं। यहाँ बात करुंगा अरविन्द मिश्र की कहानी "अंतरिक्ष कोकिला" की । "कोयल के सुत कागा पाले", ये बात वह आम आदमी भी जानता है वह भी जिसका किताबी विज्ञान से कभी कोई साबका ही नहीं पड़ा। इसके लिये से विज्ञान कथा में अलग से कुछ समझाने की जरूरत भी नहीं फिर ये कहानी कक्षा 8 का विद्यार्थी पढे या कम पढ़ा लिखा किसान, दोनों इसे आसानी समझेंगे और इसका मजा लेंगे।

पर आज ऐसी कहानियां कितनी लिखी जा रही हैं? बहुत थोड़ी सी क्योंकि इसके लिखने के लिये लिखने का हुनर चाहिये, गजब की किस्सागोई चाहिये, आम जीवन में उपलब्ध वैज्ञानिक तथ्यों पर पूरी पकड़ चाहिये (लेखक का जमीन से जुड़ा होना जरूरी है) सोचने का अलग सा तरीका चाहिये और सबसे बड़ी बात विज्ञान कथा लिखने के लिये अतिरिक्त समय चाहिये जो आज बहुत कम लोगों के ही पास है। आज के बहुत से स्वनामधन्य स्वयंभू लेखक थोड़े से समय में ही येन केन प्रकारेण अपनी तथाकथित विज्ञान कथाओं का एक बहुत बड़ा बोझ आज के विज्ञान कथा साहित्य के सीने पर छोड़ कर अमर होने की फिराक में हैं। आज विज्ञान कथा का मतलब हो गया है, एक अलग सभ्यता, एक अलग ग्रह किसी दूसरी ही दुनिया की बात। अधिकांश विज्ञान कथा लेखकों के पैर अब जमीन पर हैं ही नहीं। विज्ञान कथा आधारित फिल्मों, स्टारवार्स या स्टारट्रैक जैसे धारावाहिकों ने इस दुष्पृवत्ति को पनपने में काफी सहायता की है।

कौन है जो लेखकीय अग्नि परीक्षा से गुजरना चाहता है ?
"हिन्दी विज्ञान कथा को पाठकों का टोटा है", ये रोना आज हर मंच से रोया जा रहा है, ये हर हिन्दी विज्ञान कथा लेखक की त्रासदी है, पर ऐसा क्यों है?

सोचना ये है कि जिस तरह के पाठकों के लिये आपने अपनी विज्ञान कथा लिखी है उस प्रकार के लोगों का प्रतिशत हिन्दी भाषी लोगों में है कितना? अगर ऐसे पाठक आम समाज में एक प्रतिशत से कम हैं (जो आपकी विज्ञान कथा को समझ सकते हैं) जो जीनोम, टेलीपोर्टेशन, फोबोस ग्रह, अंतरिक्ष यात्राओं, एलिएंस आदि में रुचि रखते हैं या उसे समझ सकते है तो आपको सारे पाठकों के आधे प्रतिशत से ज्यादा तो मिलने वाले नहीं उस पर भी समय के आभाव में लोग हैं कितने जो पढ़ते हैं अब तो ज्यादातर लोग देखते हैं, पढ़ने की आदत तो दिन पर दिन घटती जा रही है। तो जितने पाठकों के लिये आपने विज्ञान कथा लिखी थी उससे आधे या चौथाई से ज्यादा पाठक तो आपको मिलने वाले नहीं, उससे कम ही मिलेंगे, तब पाठकों के टोटे का रोना क्या ? आपने विज्ञान कथा ही ऐसी "एलीट " लिखी है तो उसके पाठक भी तो थोड़े से और "एलीट" लोग ही होंगे।

अब विज्ञान कथा लेखक के सामने दो रास्ते है या तो अपने पाठकों को अपनी विज्ञान कथा के स्तर का बनायें या फिर अपनी विज्ञान कथा को पाठकों के स्तर का बनायें। पाठकों का स्तर बढ़ाना इतना आसान काम नहीं हैं और प्राकृतिक रूप से भी इसे बदलने में काफी समय लग सकता है तो फिर रास्ता एक ही बचा कि अपनी विज्ञान कथा को पाठकों के स्तर का बनाया जाये।

यहां बहुत सावधानी और लेखकीय कौशल की आवश्यकता है। इस प्रक्रिया में एक अच्छी विज्ञान कथा और लुगदी साहित्य की विभाजक रेखा कहीं-कहीं काफी पतली हो सकती है। दरअसल ये विज्ञान कथा लेखक की अग्नि परीक्षा है। कितने हिन्दी विज्ञान कथा लेखक हैं जो इस लेखकीय अग्नि परीक्षा से गुजरना चाहते ? एक कठिन विषय पर लिखी विज्ञान कथा को सुग्राह्य बनाने के लिये लेखक अगर विज्ञान कथा के विषय को परत दर परत समझाता चलेगा तो पर ऐसे में विज्ञान कथा को विज्ञान आलेख बनते देर नहीं लगती। हिन्दी के कई उत्कृष्ट् विज्ञान कथा लेखक इस असावधानी का शिकार हो चुके हैं।

दोषी है विज्ञान कथाकार भी
जब समय ऐसा हो कि विज्ञान कथा को साहित्य से खारिज करने की कुचेष्टायें चल रहीं हों तो उसे स्थापित करने के लिये विज्ञान कथाकारों को विशेष प्रयास करना चाहिये। इसका सबसे पहला सोपान है अघिक से अधिक ऐसे विज्ञान कथा साहित्य का सृजन जो अधिक प्रभावी, हृदयग्राही और संवेदी हो।

इसके लिये चाहिये होता है लेखन से पूर्व पूरा होमवर्क, कथा शिल्प का ज्ञान और पूरी लेखकीय ईमानदारी। आज की अधिकांश हिन्दी विज्ञान कथाओं में इसका आभाव साफ नजर आता है। लगता है बहुत सारे लेखकों के पास होमवर्क का समय ही नहीं है। कथा शिल्प का ज्ञान तो वैसे भी बहुत हद तक नैसर्गिक होता है पर अतिरिक्त प्रयास से उसे निखारा तो जा ही सकता है। मेरा मानना है कि विज्ञान का एक पृष्ठ लिखने के लिये कम से कम सौ पृष्ठों का अध्ययन आवश्यक होता है।

पहले तो किसी विषय पर अधिकार हासिल करना होता है तभी तो उस पर कोई अच्छी विज्ञान कथा लिखी जा सकती है। आज विज्ञान कथा लेखकों में इस "लेखकीय मजदूरी" का आलस्य साफ नजर आता है। किसी वैज्ञानिक खोज का समाचार छपा नहीं कि उसे विज्ञान कथा में उतारकर "पहले मैं" वाली आपाधापी शुरु हो जाती है।

जब विषय पर अधिकार ही नहीं तो विज्ञान कथा में तथ्यों का विरोधाभास और उथलापन साफ उजागर होने लगता है। जिस विषय को लेखक ने खुद ही नहीं समझा है वह उसे दूसरों को कैसे समझा पायेगा? कुछ विज्ञान कथा लेखकों में अपनी विज्ञान कथाओं की गिनती बढाने की चाह इतनी प्रबल होती है कि विज्ञान कथा लिखने के पश्चात वह अपने लेखन का कभी स्वमूल्यांकन नहीं करते अपितु येन केन प्रकारेण उसे प्रकाशित करने की जुगाड़ में जुट जाते हैं।

कहीं संयोग तो कहीं सम्बन्धों के हवाले से उसे प्रकाशित भी करवा लेते हैं। ऐसी विज्ञान कथाओं को कितनी स्वीकृति और प्रशंसा मिल सकती है? इससे इन उन लेखक महोदय की विज्ञान कथाओं की संख्या तो बढ़ती है पर विज्ञान कथाकारों के बीच उनका कद नहीं बढ़ता। आज के कई तथाकथित (?) स्थापित हिन्दी विज्ञान कथाकार इस पृवत्ति के शिकार है।

स्मरणीय है कि सिर्फ एक कहानी, "उसने कहा था" से इसके लेखक चन्द्रधर शर्मा गुलेरी हिन्दी साहित्य जगत में मील के पत्थर माने जाते हैं और पचासों उपन्यास लिख कर लुगदी साहित्य के उपन्यासकार कुशवाहा कांत को कोई साहित्यकार तक मानने को तैयार नहीं। आज कितने हिन्दी विज्ञान कथाकार ऐसे हैं जो अपनी विज्ञान कथा को लिखकर उसके स्तरीय न होने पर उसे फाड कर रद्दी की टोकरी में डालने का साहस करते है, जो करते है वे निश्चित रूप से हिन्दी विज्ञान कथा के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं।

क्या हिन्दी में विश्वस्तरीय कथायें लिखी जा रही हैं ?
हालांकि अपने साक्षात्कारों में कई स्थापित विज्ञान कथाकारों  [1], [2] ने बड़ी शान से यह कह दिया कि (भारतीय) विज्ञान कथायें विश्वस्तरीय है पर कितने प्रतिशत विज्ञान कथायें? क्या वे पिछ्ले वर्षों‌ में लिखी गई ऐसी 10 विश्वस्तरीय भारतीय विज्ञान कथायें गिना सकते हैं? हिन्दी में पिछ्ले वर्ष कितनी विश्वस्तरीय विज्ञान कथायें लिखी गईं हैं? है कोई जबाब देने वाला? अगर नहीं तो हिन्दी विज्ञान कथा के (?) कर्णधारों को चाहिये कि वे इस प्रश्न का उत्तर खोजें और हिन्दी विज्ञान कथा की दयनीय स्थिति को स्वीकार करें। आपसी टॉग खिंचाई को विश्राम दे कर पहले इसे सुधारें। अच्छा लेखन करके और उसे प्रोत्साहित कर के हिन्दी विज्ञान कथा के कोष को समृद्ध करें फिर मूल साहित्य में अपनी स्थिति की लड़ाई लडें।

एक लेखक का दायित्व ये भी होता है कि वह यह भी देखे कि लोकप्रिय विज्ञान के किन-किन विषयों का पूर्ववर्ती लेखकों ने अपनी विज्ञान कथाओं में (?) सदुपयोग कर लिया है। आखिर एक ही विषय पर आप पाठकों को कितनी विज्ञान कथायें पढ़वा सकते हैं? कभी-कभी तो ये लेखकीय पुनरावृत्ति अपनी सारी सीमायें पार कर जाती है। कहानी में विषय ही नहीं विचारों, यहां तक कि पूरी की पूरी कहानी की पुनारावृत्ति तक देखने को मिल जाती है। ऐसे में ये निर्धारित करना मुश्किल हो जाता है कि कौन असल है और कौन उसका क्लोन? हिन्दी विज्ञान कथा में "कथा क्लोनिंग" के ये प्रयोग निश्चित रूप से  हिन्दी विज्ञान कथा के अधोपतन का कारण बन रहे हैं।

मसीहा बहुत से हैं...
एक तो हिन्दी विज्ञान कथा में वैसे ही अच्छे विज्ञान कथाकारों का टोटा था और जो थे भी वे लेखकीय धर्म से विमुख हो मसीहा बनते जा रहे हैं और अब अपने प्राचीन लेखन को ही भुनाये जा रहे हैं।

कोई विज्ञान कथा के अप्रतिम हस्ताक्षर बन गये हैं तो कोई विज्ञान कथा के क्रूसेडर, किसी-किसी को तो लगता है कि विज्ञान कथा उन्ही के कंधों पर चढ़कर वैतरणी पार कर सकती है। कोई अनवरत (कु) लेखन में जुटे हैं तो कोई अपने अतीत के यशोगान में मुग्ध हैं। पर जिस विज्ञान कथा को बचाने के लिये, तारने के लिये या स्थापित करने के लिये वे प्राण पण से जुटे है वह विज्ञान कथा है कहॉ?

मैने अपने एक मित्र से पूछा, "कहो क्या चल रहा है," तो वे बोले, "अब तो ये जीवन विज्ञान कथा की भलाई के लिये ही समर्पित है...इसे स्थापित करवाना ही मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है।"

मैने कहा, "बहुत दिनों से आपकी कोई विज्ञान कथा नहीं आई नजर नहीं आई, आप तो बहुत विज्ञान कथायें लिखते थे?"

"क्या करें इस विज्ञान कथा को बचाने के मिशन में इतना समय लग जाता है कि विज्ञान कथा लिखने का समय नहीं बचता।"

मेरा मन एक दम से उनकी चरण रज लेने को हो आया।

"तुम्हारी याद में आलम को भूल बैठा हूं,
तुम्ही बताओ ये आलम है क्या किया जाये? "

मैने सोचा, "बहुत खूब तो आप किसकी फिक्र में दुबले हो रहे हैं, उस विज्ञान कथा की जिसे लिखने का समय भी आपके पास नहीं बचा है।"

मैंने पूछा, "क्या आप पिछले साल में लिखी गई कुछ उल्लेखनीय हिन्दी विज्ञान कथाये गिनवा सकते हैं? "

इस पर उनके मुह का जायका बिगड गया।

मै हतप्रभ था कि जब विज्ञान कथा ही नहीं है तो ये वितंडावाद किस लिये? भइया आप स्थापित विज्ञान कथाकार हो, पहले हिन्दी में अच्छी विज्ञान कथायें तो लिखो वरना विज्ञान कथा (?) के हित में किया गया आपका ये श्रम व्यर्थ चला जायेगा। समय के साथ विज्ञान कथा को दूसरा मसीहा तो मिल सकता है बिलकुल आप जैसा लेखक शायद नहीं मिलेगा। इसलिये फिलहाल तो आप हिन्दी विज्ञान कथा लिखने की फिक्र करो। अगर हिन्दी विज्ञान कथा का कोष समृद्ध हो गया बाकी का काम तो समय और विज्ञान कथा के सजग पाठक मिलकर खुद कर लेंगे।

वैचारिक दोमुंहापन
राजनीति से एक और दष्पृवत्ति के हिन्दी विज्ञान कथा के (?) कर्णधारों के बीच आगमन की आहट अब स्पष्ट सुनाई देने लगी है, वह है वैचारिक दोमुंहापन। वे आपके मित्र हैं पर आपकी सफलता से या फिर अपनी असफलता के चलते आपसे जलते हैं। सीधे-सीधे तो आपकी जड़ों में मट्ठा डाल नहीं सकते सो विष्णू की तरह मोहिनी रूप धार लिया और लगे देवताओं (अपनों) को अमृत और असुरों (विपक्षियों) को गरल बॉटने।

मौका पड़ते ही "श्रीमान जी" "श्रीमती जी" में कायान्तरित हो गये, अब ऊल-जलूल कमेंट करने में आसानी रहेगी। कोई बिना दिवंगत हुये ही "मानव" से "असुर की योनि" में चला गया कोई अंग्रेजी छोड़ कर मैथिली-बिहारी बोल रहा है। हिन्दी के कई विज्ञान कथा लेखकों ने "कायान्तरण" को आधार बना कर विज्ञान कथायें लिखीं हैं। उन कथाओं का अगर किसी विवेक शील व्यक्ति पर इतना जबरदस्त प्रभाव पड़े कि वह विज्ञान कथा के मूल भाव का ही अपने वास्तविक जीवन में अनुसरण करने लगे तो कथाकार का कथा कौशल “लांघनीय है। कायान्तरण पर ऐसी, और मन को इतने अंदर तक प्रभावित करने वालीं इन विज्ञान कथाओं के लेखकों को मेरा नमन है।

वस्तुत: जिसे मैं "वैचारिक दोमुंहापन" कह रहा हूं वह सही मायनों में उनका "व्यक्तिगत फ्रस्ट्रेशन" है, किसी की अगड़ी में अपनी लंगड़ी के कामयाब न हो पाने का फ्रस्ट्रेशन, सारी कोशिशों के बाद भी उसकी कमीज से अपनी कमीज़ के ज्यादा सफेद न हो पाने का फ्रस्ट्रेशन (वरना खुले दिल से की गई आलोचनाओं में मुंह छिपाई की क्या आवश्यकता है? ये पृवत्ति आज की हिन्दी विज्ञान कथा व उसके लेखक की साहित्यक स्थिति को सिर्फ पतन की ओर ही ले जा सकती है और कहीं नहीं।

राजनीति, व्यक्तिगत द्वेष और खेमे बाजी

ये बीमारी है तो मूल साहित्य की, पर संक्रामक रोग की तरह ये विज्ञान कथा लेखकों के बीच भी फैल रही है। हिन्दी विज्ञान कथा लेखकों में तो इसने महामारी का रुप ले लिया है। उसकी कमीज मेरी कमीज से सफेद कैसे, अरे जो काम हम नहीं कर पाये वह तुमने कर दिया, ये हमें कैसे सुहायेगा? अब तो अब "वन पाइन्ट प्रोग्राम" है कि मिटाकर रहेंगे तुम्हें।

अरे इतना छोटा सा तो हिन्दी विज्ञान कथा लेखकों का समुदाय है कि इकठ्ठा करो तो एक ठीक-ठाक कान्फ्रेंस भर की संख्या पूरी नहीं होती। हर सत्र में पुनरावृत्ति करनी पड़ती है उसमें भी ये खेमे बाजी (हमारा ग्रुप अलग है, उसमें तुम्हारे ग्रुप का प्रवेश वर्जित है... तुम हमारे लोगों को तोड़ोगे तो हम तुम्हारे खेमे के लोगों को तोड़ लायेंगे... आखिर कहा हैं वे खेमे? सिर्फ कुछ लोगों के कुत्सित मस्तिष्कों‌ में।

तुम्हारे ग्रुप की खबरें तक हमारे लोगों पास तक न आ पायें इसका पक्का इंतजाम किया है हमने...अपने लेटर बॉक्स के मुंह पर टीन की तख्ती जड़ दी है हमने...तुम्हारी किसी भी चिट्ठी को हम अपने आदमियों के हाथ न लगने देंगे, गोया हर आदमी तुम्हारे "डिब्बे" में चिट्ठी डालने को लालायित बैठा है।

एक ओर महामहिम अपने घर की दीवारों पर ही चिठ्ठयां पेन्ट किये जा रहे हैं, तुम कंकड़ फेंकोगे तो हम ईंट...वाह भाई वाह क्या लॉजिक है...पहले कहो कि आ बैल मुझे मार फिर जख्मों की नुमाइश? क्या इस सब से आपसी रंजिश (किस बात की) का फैसला हो जायेगा?

इससे किसी भी हालत में हिन्दी विज्ञान कथा का भला नहीं होने वाला। पहले हिन्दी में (प्रभाव में और संख्या में) इतने विज्ञान कथा लेखक तो पैदा हों उनमें राजनीति की जा सके।

जो लोग अच्छा काम कर रहे हैं उनका साथ दो। अगर साथ नहीं दे सकते तो उन्हें शान्ति से काम तो करने दो। उनकी टांग खिंचाई हिन्दी विज्ञान कथाकार का या हिन्दी विज्ञान कथा किस तरह से भला करेगी? आशीष नहीं दे सकते तो श्राप तो न दो। कर सको तो हिन्दी विज्ञान कथा लेखन की फिक्र करो। वक्त और विधा अपना मसीहा खुद ढ़ूंढ़ लेगी, उसकी फिक्र करने की जरूरत किसी को नहीं है। ये द्वेष, ये खेमेबाजी हिन्दी विज्ञान कथा व हिन्दी विज्ञान कथाकार को सिर्फ एक ही तरफ ले जा सकती है वह है पतन। इसे विषय पर अगले किसी अंक में विस्तार से लिखुंगा।

अन्तत:
मेरे अल्प ज्ञान के अनुसार अभी भी हिन्दी विज्ञान की दशा चिन्ताजनक है और दिशा में भी सुधार की बहुत आवश्यकता है। समय का तकाज़ा है कि हिन्दी विज्ञान कथा लेखक अपने आपसी मतभेद भुलाकर, एकजुट होकर पहले तो हिन्दी विज्ञान कथा को कोष को समृद्ध करें और इसके साथ-साथ इस विधा को स्थापित करने के प्रयास में लगे रहें। सिर्फ "अरण्य रोदन" से कुछ होने वाला नहीं है, मात्र उपदेशों से कुछ बनेगा नहीं। काजी जी के शहर की फिक्र में दुबले होने से शहर का भला नहीं होता।

 इसके लिये पहले तो उत्कृष्ठ विज्ञान कथायें लिखनी होंगीं, निम्नस्तरीय विज्ञान कथाओं की समीक्षा करते समय आपसी समबन्धों को भूलना होगा। "तू मेरी ऊंची कर मैं तेरी", वाली प्रवत्ति को रोकना होगा, उसकी भर्तसना करनी पडेगी।

साहित्य में गुटबाजी, खेमेबाजी, व्यक्तिगत द्वेष साहित्य को कहीं नहीं ले जाते। इन प्रवत्तियों की यदि मुखर होकर निन्दा न की गयी तो लम्बे अरसे तक हिन्दी विज्ञान कथा लेखक का "दौलू" ही बने रहना निश्चित है। आइये आज से ही आपसी मतभेद भुलाकर हिन्दी विज्ञान कथा के उत्थान के भागीरथ प्रयास में अपनी-अपनी शक्ति भर हाथ बटायें।

नोट- प्रस्तुत लेख विशुद्ध रूप से लेखक की अपनी कल्पनाओं और विचारों का निरूपण है किसी व्यक्ति, घटना या परिस्थिति से इसकी समानता या सम्बद्धता मात्र संयोग ही है।



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by Dr. Radut.