"प्रौद्योगिकी के उपयोग में अर्थात न केवल उत्पादन में वरन उत्पादित वस्तुओं के उपभोग में भी वैज्ञानिक दृष्टि अत्यंत आवश्यक है, अन्यथा ऐसा समाज प्रौद्योगिकी का स्वामी बनने के स्थान पर उसका दास बन जाएगा।"
एक बार मैने मुम्बई से हापुस आम बुलवाए। पिटारा आया तो बिटिया ने एक आम निकाला और दौडकर आई। मेरी पत्नी ने देखते ही कहा, “ यह आम तो सडा है ! देखो सडे आमों का पिटारा आ गया. मैने पहले ही कहा था. पार्सल से आम नहीं खरीदे जाते। अब खा लो सडे आम।"
मैने कहा, ”एक आम सडा है तो इसका मतलब यह तो नहीं कि सब आम सडे हैं।"
पत्नी:”अरे जब पहला ही सडा है तो सारे आम सडे होंगे।” इसके पहले कि मैं कुछ कहता मेरा बेटा एक और आम लेकर आ गया।
पत्नी फ़ौरन बोली, “देख लो! यह भी सडा निकला! अब तो मान लो कि सारे आम सडे हैं।"
मैं: “अरे भाई यह चावल की बटलोई नहीं कि एक चावल देख लिया तो सब देख लिये। चलो और देख लेते हैं।” जाकर देखा तो ऊपर के सारे आम सडे दिखे।
मेरी पत्नी और जोश से बोली, “मेरी बात आप कैसे मान लेंगे! अब आंखों देखी तो मान लो।”
मैने कहा, “यह ऊपरी परत को निकालकर देखते हैं।" ऊपरी परत निकाली तो दूसरी परत के आम भी सडे थे, किन्तु कम। और पत्नी ने अपना कथन जोरों से दुहरा दिया। तीसरी तथा अन्य परतें ठीक निकलीं।
ऊपर की घटना दर्शाती है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण परिवार में या समाज में उठे मतभेदों को सरलतापूर्वक शान्त कर सकता हैं, और इस घटना को प्रस्तुत करने का उद्देश्य इतना ही है कि वैज्ञानिक (गणितीय) दृष्टिकोण के अनुसार यदि किसी पिटारे या अन्य बहुल 'आबादी' (पॊप्युलेशन) ( सांख्यिकी में कोई भी वस्तु या व्यक्ति अधिक संख्या में हों और उनके विषय में कुछ निष्कर्ष निकालना हो तब उन बहुल वस्तुओं या व्यक्तियों के समुदाय को 'आबादी' कहते हैं.) में से कुछ नमूनों को ही देखकर सब के विषय में निष्कर्ष निकालना हो तब नमूने यथा सम्भव 'यादृच्छिक' (रैन्डम) रूप से चुनना चाहिये. अन्यथा वही गड्बडी हो सकती है जो ऊपर की घटना में हो रही थी. और, मजे की बात यह कि ऐसा कर सकने के लिये सांख्यिकी का ज्ञान अनिवार्य नहीं है, थोडे खुले दिमाग से सोचने पर यह बात समझ में आ जाती है कि यदि हम नमूनों को बिना किसी पूर्वाग्रह के चुने तब वे हमारे पूर्वाग्रहों से मुक्त रहते हुए अपनी आबादी का प्रतिनिधित्व अधिक सही करेंगे, और आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले नमूनों की कम संख्या भी अधिक संख्या के प्रतिनिधित्व न करने वाले नमूनों की अपेक्षा सत्य के अधिक निकट होगी। ऊपर की घटना में केवल ऊपरी परत के आम पूरे आमों का प्रतिनिधित्व तो नहीं कर सकते। अर्थात वैज्ञानिक समझ तथा सामान्य बोध (कामन सैन्स) में गहरा सम्बन्ध है। और यह भी स्पष्ट कर दूं कि ऊपर के उदाहरण में पुरुष की श्रेष्ठता दिखलाना उद्देश्य नहीं है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण या सोच या समझ या मनोवृत्ति क्या है? कुछ विद्वान यह आवश्यक मानते हैं कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण में वैज्ञानिक विधियों का उपयोग हो। वैज्ञानिक विधि में उत्सुकता, जिज्ञासा, अवलोकन, मापना - जोखना, विश्लेषण, परिकल्पना और जाँच पडताल के सोपन चढने के पश्चात सिद्धान्त बनते हैं। ऐसा नहीं समझना चाहिये कि वैज्ञानिक विधि केवल वैज्ञानिक कार्यों के लिये ही होती है, वरन यह हमारे जीवन के लगभग सभी कार्यों पर लागू होती है। यह तो हो सकता है कि हम हमेशा इस पद्धति का उपयोग अनेक कारणों से न कर पाएं, या न करें, किन्तु हमें यथा सम्भव प्रयत्न तो करना ही चाहिये क्योंकि इस पद्धति में धोखा या अंधविश्वास या पूर्वाग्रह सफ़ल नहीं हो पाते। दुनिया में चालाक लोग आम आदमी के अज्ञान का या उनके अंधविअश्वासों का या पूर्वाग्रहों का लाभ उठाकर उनका शोषण करते हैं या लूट लेते हैं। इस पद्धति का उपयोग अपने कार्य तथा निष्कर्ष को वस्तु सापेक्ष तथा व्यक्ति निरपेक्ष रखने के लिये किया जाता है, जो अधिकांशतया हो भी जाता है। किन्तु अनेक दार्शनिकों की मान्यता है कि वैज्ञानिक विधियां भाषा और संस्कृति से प्रभावित रहती हैं, अत: यह भी कार्य तथा निष्कर्ष को वस्तु सापेक्ष तथा व्यक्ति निरपेक्ष नहीं रख पाती हैं। सामान्यतया हमें इस द्वद्व की चिन्ता नहीं करना पडती है और हम अपना कार्य यथा सम्भव वैज्ञानिक पद्धति से करते हुए धोखा धडी से और पूर्वाग्रहों से बचते हुए कर सकते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण या सोच या समझ या मनोवृत्ति का एक और लाभ यह है कि ऐसे व्यक्ति के मन या मस्तिष्क में अनावश्यक द्वन्द्व नहीं होते अत: उसकी सोच सुलझी हो सकती है। ऐसे व्यक्ति धार्मिक कट्टरता से तो बचते ही हैं वे वैज्ञानिक कट्टरता से भी बच सकते हैं।वैज्ञानिक दृष्टिकोण या सोच या समझ या मनोवृत्ति वाले व्यक्ति का मस्तिष्क खुला होता है, उदार होता है और विरोधी को सुनने के लिये तैयार रहता है, उसमें असुरक्षा की भावना बहुत कम हो जाती है। औ वह समझता है कि मतभेद के कारण 'मनभेद' नहीं करना है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण में यह मान्यता है कि कोई भी प्रेक्षक प्रकृति का अवलोकन बिना पूर्वाग्रह के तथा बिना संस्कृति के प्रभाव के कर सकता है। एक तरफ़ तो वे मानते हैं कि वैज्ञानिक अवलोकन प्रेक्षक से निरपेक्ष होते हैं। और दूसरी तरफ़, अनेक आधुनिक वैज्ञानिक विद्वान, विशेषकर क्वाण्टम यांत्रिकी मानने वाले, यह मानते हैं कि वैज्ञानिक अवलोकन प्रेक्षक सापेक्ष होते हैं। यह विवाद चल रहे हैं और वैज्ञानिक अपना कार्य किये जा रहे हैं क्योंकि अन्तत: किसी भी सिद्धान्त को सत्य होने के लिये परीक्षण में खरा उतरना ही पडता है।
आम भाषा में सामान्य व्यक्ति के लिये लिखे गए लेखों में अनेक विचारक वैज्ञानिक दृष्टिकोण या सोच या समझ या मनोवृत्ति को (साइन्टिफ़िक टैम्पर) लगभग समानार्थी मानते हैं। वैज्ञानिक सोच या वैज्ञानिक समझ की शर्त है कि निर्णय विषयनिष्ठ जानकारी तथा वस्तुनिष्ठ तर्क के आधार पर लेना चाहिये, यही शर्त विज्ञान में कार्य करने की भी है। मैं भी इस लेख में उपरोक्त बारीकियों में न जाते हुए वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा वैज्ञानिक सोच (साइन्टिफ़िक टैम्पर) को लगभग समानार्थी मान रहा हूं। किसी भी 'सोच' या विचार प्रक्रिया में ( कविता आदि रचनात्मक साहित्य में नहीं) बुद्धि का स्थान मन के ऊपर होना चाहिये क्योंकि मन इच्छाओं, संवेदनाओं, आग्रहों का भी स्रोत तथा घर होता है निर्णय बुद्धि द्वारा मन पर पूरे नियंत्रण के साथ लेना चाहिये। इस तरह वह सोच यथा सम्भव उस व्यक्ति के पूर्वाग्रहों से मुक्त हो सकती है। स्पष्ट है कि इस प्रक्रिया में शिक्षा द्वारा बुद्धि का समुचित विकास होना तथा सशक्त होना आवश्यक है। दृष्टव्य है कि हिन्दू तथा अन्य धर्मों में हमेशा मन पर बुद्धि के नियंत्रण को वस्तुनिष्ठ सोच के लिये आवश्यक माना है।
सत्य को खोजने की विज्ञान में अनेक पद्धतियां हैं जिनके अनुसार 'देखने' (सोचने) को वैज्ञानिक दृष्टिकोण कहते हैं. उदाहरण के लिये उस की एक पद्धति है 'आगमनिक' (इन्डक्टिव)। इस पद्धति में, मान लें, कि हमें कॊओं का रंग निश्चित करना है। तब हम कह सकते हैं कि मैने एक कॊआ देखा उसका रंग काला है. फ़िर दो कॊए देखे, उनके रंग भी काले, फ़िर तीन और फ़िर दस और फ़िर यादृच्छिक चुने गए सौ कॊए देखे, सभी के रंग काले। तब हम कह सकते हैं कि ' कॊओं का रंग काला होता है '। किन्तु भविष्य में यदि एक भी कॊआ सफ़ेद दिख गया तब हमें पुराने नियम की जाँच पडताल करना पडेगी। आगमनिक पद्धति में कुछ घटनाओं का अवलोकन किया जाता है और उनके आधार पर एक वैश्विक नियम या परिकल्पना प्रस्तुत की जाती है। यदि यह और अवलोकनों द्वारा पुष्ट होती है तो एक सिद्धान्त के रूप में स्वीकार की जाती है। किन्तु भविष्य में यदि इस सिद्धान्त का विरोध करती कोई घटना आ जाती है तब इसकी पुन: जांच पडताल की जाती है। आगमनिक सिद्धान्त तो हमेशा सत्य के कठघरे में खडे रहते हैं, क्योंकि भविष्य में कब कोई घटना आकर उस सिद्धान्त को चुनौती दे दे, कोई नहीं जानता, और ऐसी ही सोच वैज्ञानिक सोच कहलाती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा विज्ञान के ज्ञान में भी गहरा सम्बन्ध है, किन्तु हमेशा अनिवार्य नहीं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण या सोच मनुष्य को, चाहे वह आगमनिक पद्धति को जानता हो या न जानता हो, ऐसी चुनॊती के लिये तैयार रखती है। ऐसी सोच के लिये बुद्धि का समुचित विकास आवश्यक है।
आगमनिक सिद्धान्त से एक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि खोजे गए सत्य की अपेक्षा 'सत्य की खोज' अधिक मह्त्वपूर्ण होती है. इसे यदि हम अपने जीवन पर लागू करें तब हम बहुत से निरर्थक विवादों से बच सकते हैं। इसके अभ्यास के लिये भी आगमनिक सिद्धान्त का जानना अनिवार्य नहीं है. यह भी थोडे से सोचने से समझ में आ सकता है : हमें अपनी बात पर अडने की जरूरत नहीं है, अपने विचार को अपनी अस्मिता या आत्म सम्मान से नहीं जोडना है, बस सत्य को खोजना है। अर्थात स्पष्ट है कि वैज्ञानिक समझ तथा सामान्य बोध (कामन सैन्स) में गहरा सम्बन्ध है।
बरसों पहले एक लेख पढा था, “'कखग' धर्म विज्ञान संगत है.” वह लेख अपने तर्कों में बहुत कमजोर था, और वह अपनी अवधारणा सिद्ध नहीं कर पाया। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं निकलता कि 'कखग' धर्म विज्ञान संगत नहीं है, या कि 'कखग' धर्म विज्ञान संगत है, वरन यह कि केवल वह लेख अपने उद्देश्य में असफ़ल हुआ। वैज्ञानिक सोच में और तार्किक सोच में गहरा सम्बन्ध है।
एक विचार प्रयोग करें। मान लें कि सौ व्यक्तियों ने मुम्बई के पांच व्यापारियों से आम खरीदे। पांच व्यक्तियों के पास जो आम पहुंचे वे सडे थे। ऐसे एक व्यक्ति ने पुलिस से शिकायत कर दी। पुलिस ने पडताल करने पर पाया कि सारे सडे आम उन पांच में से केवल एक व्यापारी द्वारा ही भेजे गए थे। पुलिस ने उस व्यापारी पर मुकदमा चलाया। और न्यायालय में उस व्यापरी ने अपनी बचत में कहा कि उसने तो तीस व्यक्तियों को आम भेजे थे और पच्चीस व्यक्तियों को आम ठीक मिले अत: वह दोषी नहीं है। न्यायाधीश ने फ़ैसला दिया कि यद्यपि उस व्यापारी द्वारा भेजे गए सारे आम सडे नहीं थे, किन्तु सारे सडे आम उसी व्यापारी के आमों में से थे। अत: वह दोषी है और उसे जुर्माना देना होगा। इस घटना में कोई वैज्ञानिक सिद्धान्त तो नहीं लगता किन्तु सोच तार्किक है, और सच्चाई की ओर ले जाती है, इसलिये वैज्ञानिक है।
वैज्ञानिक दृष्टि या वैज्ञानिक सोच (साइन्टिफ़िक टैम्पर) में मस्तिष्क खुला रहता है और घटनाओं को समझने के लिये वह किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं रहता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वह खोज करते समय किसी मान्यता या योजना, जो कि खोज के लिये आवश्यक होती है, के तहत कार्य नहीं करता, वरन वह ऐसा करते समय इसके प्रभाव के प्रति सचेत रहता है, और विपरीत तथ्यों के मिलने पर उस मान्यता में परिष्कार के लिये तैयार रहता है।
अनेकानेक लोग राहु केतु द्वारा सूर्य या चन्द्रमा के ग्रसने के कारण सूर्य या चन्द्र ग्रहण की घटना के होने को मानते हैं। ऐसी मान्यता अवैज्ञानिक है, किन्तु इस कारण महाभारत के इस वर्णन को ही अवैज्ञानिक घोषित करना स्वयं में अवैज्ञानिक है ! हां इसे फ़ैन्टैसी घोषित किया जा सकता है, क्योंकि 1. महाभारत की यह कथा अपनी विज्ञान संगति का दावा नहीं करती. यह घटना तो एक फ़ैंन्टैसी है जिसका उद्भव एक और समुद्र मन्थन जैसी और भी बडी फ़ैन्टैसी से हुआ है। इसका एक महत उद्देश्य ग्रहण के अज्ञानजनित भय को मिटाना है, क्योंकि इस घटना में राहु और केतु दोनों राक्षस मार दिये गए हैं, और अमृत से लाभान्वित उनके कटे हुए सिर सूर्य या चन्द्र को निगलने के बाद भी उनका नाश नहीं कर सकते। २. सौरमण्डल की रचना का और उसकी गति के नियमों का अनुसंधान तो आर्य भट ने आज से १५०० वर्ष पूर्व और कोपरनिकस से १००० वर्ष पूर्व कर लिया था। अतएव लगभग तब से तो जानकार व्यक्तियों के मन में यह अतार्किक भय नहीं ही रहा होगा। ३. ज्योतिष शास्त्र में वर्णित है कि राहु और केतु अंतरिक्ष में वे बिन्दु हैं जिन पर चन्द्र और पृथ्वी के आने पर ग्रहण होते हैं जो वैज्ञानिक तथ्य हैं। जैसा कि पश्चिम में देखा गया है, वहां के धर्म में विज्ञान का विरोध है। किन्तु धर्म में वैज्ञानिक दृष्टि का विरोध होना अनिवार्य नहीं है। हिन्दू (सनातन) धर्म तथा विज्ञान की मूल मान्यताओं में मतभेद है, किन्तु उसके दर्शन में वैज्ञानिक दृष्टि ही कार्य करती है। पश्चिम में कोपरनिकस के सूर्यकेन्द्रित सौर मंडल की अवधारणा का अमानवीय विरोध हुआ था, किन्तु, भारत में कोपरनिकस के १००० हजार वर्ष पूर्व भी आर्य भट का बौद्धिक या अतार्किक विरोध के अतिरिक्त, अमानवीय विरोध नहीं हुआ।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण या वैज्ञानिक सोच किसी भी घटना पर निर्णय देने के पूर्व गहरे सोच की माँग करती है। अंधविश्वासों, विशेषकर भयजनित अंधविश्वासों को, मिटाना बहुत कठिन कार्य है। सबसे विकसित देश यू एस ए में लगभग ४० % लोग अनेक घरों को भुतहा मानते हैं। वैज्ञानिक सोच या दृष्टि मनुष्य को लोभ, मोह, अहंकार, भय और क्रोध आदि के दुष्प्रभाव से बचाती है, मनुष्य की सोच को शुद्ध करने में या दृष्टि को निरपेक्ष करने में बहुत मदद करती है।
विज्ञान का ज्ञान वैज्ञानिक सोच के विकास में मदद करता है, किन्तु, शायद आपको आश्चर्य हो, वह आवश्यक नहीं है। ऐसे विज्ञान के अनेकानेक जानकार मिलते हैं जिनकी सोच वैज्ञानिक नहीं होती।
वे भी अंधविश्वासों से पीडित होते हैं। और ऐसे व्यक्ति भी बहुत मिलते हैं जिन्होने विज्ञान पढा नहीं है किन्तु जिनकी सोच वैज्ञानिक होती है। इसका विकास कैसे होता है? इसके लिये एक तो सत्य की खोज का संकल्प होना चाहिये और दूसरे सोचने की शक्ति। थामस माल्थस का आबादी पर विचार और श्री अरोबिन्दो के अध्यात्म पर विचार वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित हैं। उन्होने भी कहा है और तैत्तिरीय उपनिषद ( शिक्षा वल्ली) में गुरु अपने शिष्यों से शिक्षा समापन के समय कहते हैं : “ जो हमारे गुण निन्दनीय नहीं हैं उनका ही अनुकरंण करना.”। ईसा पूर्व छठवीं शती में हुए बुद्ध का दृष्टिकोण आश्चर्यचकित करने वाला वैज्ञानिक है : “ अपने अध्यापक के कथनों पर केवल इसलिये विश्वास नहीं करना क्योंकि वे उनके कथन हैं, वरन उनकी जाँच पडताल करने के बाद जो कल्याणकारी लगे उसे ही मानना।" अन्ध भक्ति और अन्धविश्वास को भारत में प्रारम्भ से ही त्याज्य बतलाया गया है।
वैज्ञानिक सोच या उसका तर्क भी कभी कभी अवैज्ञानिक लग सकता है, जैसे आइन्स्टाइन ने जब पहली बार कहा कि प्रकाश की किरण को गुरुत्व बल अपनी और खींचता है तब उनकी बात को कोई भी वैज्ञानिक मानने को तैयार नहीं थे, यद्यपि उन्होने अपने इस कथन के लिये सटीक तर्क दिये थे। दृष्टव्य है कि तर्क भी बहुत पेंचीदा हो सकता है। किन्तु आम आदमी की वैज्ञानिक सोच सीधी और सरल होती है क्योंकि वह आम जीवन की सच्चाइयों का सामना सकारात्मक दृष्टि से करती है। यदि ऐसी वैज्ञानिक दृष्टि वाले जन किसी समज में बहुमत में हैं तब वह समाज व्यर्थ की मुश्किलों मैं नहीं फ़ँसेगा।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से भिन्न विषयों में भी ज्ञान न केवल प्राप्त करने के लिये वरन आत्मसात करने के लिये वैज्ञानिक समझ अनिवार्य है, क्योंकि एक तो यह अन्धविश्वास का विरोध करता है और दूसरे, ज्ञान को सही समझने के लिये कथनों में, प्रिकल्पनाओं में य सिद्धान्तों में कार्य कारण के आपसी समबन्धों को समझना बहुत आवश्यक होता है। हमारे देश के प्रसिद्ध समाज शास्त्री अपने देश की प्रगति के लिये पश्चिम का अनुकरण आवश्यक मानते हैं ! यह तो ठीक है कि पश्चिम हमसे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में हम से बहुत आगे है, किन्तु अध्यात्म में, समाज शास्त्र आदि में तो हमसे आगे नहीं है। और समाज की संक्ल्पना तो उस समाज की जीवन दृष्टि पर निर्भर करती है। अत्: पश्चिमी समाज की संरचना हमारे जीवन के अनुकूल नहीं होगी, औरुस की नकल का दुष्परिनाम हम आज भुगत रहे हैं। अत: हमें विज्ञान में उनका अनुसरण करना है, किन्तु ऐसा सामान्य या सार्वभौम नियम तो अवैज्ञानिक है। किन्तु हमें यह स्पष्ट समझ लेना चाहिये कि विज्ञान में भी उनका अनुसरण करने से हम उनकी बराबरी नहीं कर सकते। एक तो इसलिये कि वे हमें ऐसा नहीं करने देंगे। और दूसरा यह कि नकल करने वाला तो पीछे ही रहेगा। तीसरा यह कि ऐसा भारतीय विद्यार्थी विज्ञान के उपयोग में विदेशों के लिये उपयोगी कार्य अधिक करेगा, अपने देश के लिये कम, जैसा कि आप हमारे देश में देख सकते हैं ! हमें अपनी गायों तथा पारम्परिक कृषि के तन्त्र को समझते हुए पश्चिम की रासायनिक खाद एवं कीटनाशक वाली पद्धति का अनुकरण नहीं ही करना था। हम अपनी उस गलती से अभी तक नहीं सीखे हैं और अब जी एम अर्थात जीन संवर्धित कृषि की अन्धी नकल कर रहे हैं, जिसके विषय में हमारे पास पर्याप्त ज्ञान नहीं है, और जो कि वहां की जी एम कम्प्नियां नियंत्रित करती हैं। अर्थात हम अपने अन्न के बीजों के लिये उन कम्पनियों पर निर्भर करेंगे। यह कहने का मेरा उद्देश्य इतना ही है कि हमारी सोच में इतनी वैज्ञानिकता तो होना ही चाहिये कि हम यह समझ सकें कि नकल करने से नकल करने की मनोवृत्ति अधिक पनपती है, आविष्कार करने की नहीं। अर्थात हमारे अनेक वैज्ञानिकों की सोच में वैज्ञानिक समझ की कमी है। और कहने का मेरा उद्देश्य यह भी है कि हममें से कुछ में इतनी वैज्ञानिक समझ भी है और हममें मौलिक अनुसन्धान करने की अद्भुत शक्ति भी है जैसा कि होमी भाभा, विक्रम साराभाई, ए पी जे अब्दुल कलाम आदि ने कर दिखाया है, बस दृढ देशप्रेम तथा समर्पण होना चाहिये।
यह तो स्वत: ही स्पष्ट है कि आज के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के युग में आर्थिक प्रगति के लिये विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का ज्ञान तो अनिवार्य है ही, वैज्ञानिक दृष्टि या समझ भी अत्यंत आवश्यक है, अन्यथा ऐसा देश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में और इसलिये आर्थिक समृद्धि में पिछडा या पराश्रित ही रहेगा। प्रौद्योगिकी के उपयोग अर्थात न केवल उत्पादन में वरन उत्पादित वस्तुओं के उपभोग में भी वैज्ञानिक दृष्टि अत्यंत आवश्यक है, अन्यथा ऐसा समाज प्रौद्योगिकी का स्वामी बनने के स्थान पर उसका दास बन जाएगा।
ऐसा बहुत विचारक तथा कथाकार मानते हैं कि वैज्ञानिक सोच सृजनात्मक लेखन में बाधा डाल सकती है क्योंकि कथाकार को तो तर्कों से बँधना नहीं है ताकि उसकी कल्पनाशीलता रचना कर सके.। जैसे, कथाओं में अतार्किक मोड आते रहते हैं जो पाठक की कथा में रोचकता तथा जिज्ञासा बनाए रखते हैं। वे मनुष्य के व्यवहार को दर्शाते हैं जो स्वयं में अतार्किक हो सकता है। किन्तु यदि गहराई से देखें तब इन दोनों में वास्तव में विरोध नहीं है। कथा में चाहे जैसे मोड हों, अन्तत: उन्हें कथा के संयोजन में तर्क संगति के साथ होना ही है। उदाहरण के लिये प्रेमचन्द के ( पंच परमेश्वर) पात्र तो घनिष्ठ मित्र होते हुए शत्रु- सा व्यवहार करते हैं. किन्तु बाद में उनका तर्क समझ में आता है। फ़्रांज काफ़्का जैसा साहित्यकार अपनी कल्पनाशक्ति की उडान में अतार्किक हो सकता है। किन्तु उसकी रचना में भी तर्कसंगति यदि स्पष्ट नहीं तो अदृश्य अवश्य रहती है, जो थोडा सोचने पर दिख जाती है। टी एस इलियट जब कहते हैं कि 'एप्रिल इज द क्रुएलैस्ट मन्थ' या 'ही मैजर्ड हिज लाइफ़ विथ काफ़ी स्पून्स', तब वे अतार्किक लगते हैं, किन्तु थोडा सोचने पर उनका तर्क समझ में आ जाता है। जब हैम्लैट कहता है "आई मस्ट बी क्रुएल टु बी काइन्ड " तब हमें शेक्सपियर की यह अतार्किक बात समझ में आती है। जब कबीर कहते हैं, “जल बिच मीन पियासी", हमें उनकी उलटबांसी समझ में आती है। तुलसी दास जब कहते हैं, “श्याम गौर किमि कहौं बखानी, गिरा अनयन नयन बिनु बानी”, तब हमें उनकी वैज्ञानिक दृष्टि आश्चर्य चकित कर देती है। रबिन्द्र नाथ ठाकुर, मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर आदि की कृतियों से ऐसे अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं जो दर्शाते हैं कि महान साहित्यकार वैज्ञानिक सोच वाले होते हैं। यहां तक कि फ़ैन्टैसी भी तर्क संगति रखना चाहती है चाहे उसके तर्कों का आधार लेखक की अपनी मान्यता ही क्यों न हो। कलाकार के लेखन को अन्तत: अर्थ का संप्रेषण तो करना ही है, जो बिना दृश्य या अदृश्य तर्क संगति के बहुत कठिन होता है। मेरा तात्पर्य यह नहीं है कि अ-वैज्ञानिक सोच उपयोगी नहीं होती, होती है, खूब होती है. साहित्यकार, कलाकार, चित्रकार, कवि, प्रबन्धक और यहं तक कि कुछ विचारक भी इस का उपयोग करते हैं। उदाहरण के लिये व्यापारिक संस्थानों के प्रबन्धकों को मह्त्वपूर्ण निर्णय लेने होते हैं जिन पर वैज्ञानिक दृष्टि से निर्णय लेने के लिये उनके पास पूरी जानकारी नहीं होती, तब उन्हें अपने 'आन्तरिक बोध', जिसे प्रसिद्ध अर्थ शास्त्री कीन्स 'एनिमल स्पिरिट' कहते हैं, के आधार पर ही निर्णय लेना पडता है। ऐसे अपवादों को छोडकर वैज्ञानिक दृष्टि ही जीवन को सरल, सफ़ल तथा सरस बनाती है।
वैज्ञानिक सोच विज्ञान की तरह ही विश्व का सत्य ही खोजती है। वैसे तो विज्ञान कथाकार विज्ञान के भविष्य की खोज करता ही है, वह मानव तथा विज्ञान के सम्बन्धों के, मानव व्यवहार के सत्य को भी खोजता है। तब कथाकार तथा वैज्ञानिक सोच, इन दोनों में विरोध कैसा, वरन इनमें तो सहयोग ही लाभदायक है। विज्ञान कथाकार इन दोनों के गुणों से सम्पन्न होता है।