‘साइंस फिक्शन', यह शब्द सामने आते ही मस्तिष्क में उभर आती हैं हाई टेक फिल्में, जिनमें विज्ञान का अद्भुत संसार बसा हुआ है। जिसमें विशालकाय मशीनों के सामने अदना सा मानव जूझता हुआ दिखाई दे रहा होता है। जिसमें एलियेन्स पूरे यूनिवर्स का चक्कर लगा रहे होते हैं। यह सब देखते हुए यह ख्याल भी दिमाग में नहीं आता कि साइंस फिक्शन का असली उद्देश्य क्या है? क्या ऐसे माहौल की रचना करना जो लोगों के लिए नया और अपरिचित हो? क्या आने वाली समय की कहानी बताना जो हमारे मरने के भी सैंकड़ों साल बाद आने वाला है?
आंशिक रूप से इन सवालों का जवाब सकारात्मक हो सकता है। लेकिन कम से कम वैज्ञानिक साहित्य या साइंस फिक्शन का यह मूल उद्देश्य हरगिज नहीं हो सकता। जहां तक अपरिचित माहौल की रचना की बात है तो ये काम भूत प्रेत की तिलस्मी कहानियां ज्यादा अच्छा कर लेती हैं। वैज्ञानिक साहित्य का असली मकसद तो समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना ही है। यानि विज्ञान समाज में इस तरह रस बस जाये कि आम आदमी भी वैज्ञानिक बनकर सोचने लगे और उसे खुद भी इसका पता न हो तो यही वैज्ञानिक साहित्य की सफलता होती है।
इस बारे में अमेरिका का उदाहरण लिया जा सकता है। वैज्ञानिक विकास की दृष्टि से अमेरिका पूरे विश्व में अव्वल नम्बर पर है। निस्संदेह इसके पीछे वहां के महान वैज्ञानिकों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। लेकिन साथ ही इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि वैज्ञानिकों की फौज पैदा करने में वहां के साहित्य और विज्ञान आधारित हालीवुड की फिल्मों ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई। वहां के समाज में विज्ञान इस तरह व्याप्त हो गया है कि म्यूजिक एलबम में भी एलीमेन्ट, पीरियाडिक टेबिल और कार्बन जैसे शब्द सुनने को मिलते हैं। वहां बनने वाली फिल्मों की आमतौर पर दो ही कैटेगरी होती है। या तो साइंस फिक्शन या फिर हारर।
विज्ञान साहित्य लिखते वक्त जरूरी नहीं कि उसमें किसी आधुनिक विशाल लैब की बात की जाये। या बहुत बड़े साइंटिस्ट की बात की जाये। आम जिंदगी में व्याप्त विज्ञान को भी दिखाया जा सकता है। एक रिक्शेवाला अपने रिक्शे को किस तरह का आकार दे कि चलाते समय उसे कम से कम ताकत लगानी पड़े। या पास की नदी से खेत तक पानी लाने में किसान कौन सी तरकीब लगाये कि खर्च बचाते हुए उसके खेत को पूरा पानी मिल जाये। इन सब के बारे में वैज्ञानिक साहित्य काम कर सकता है। इसमें आम आदमी रुचि भी लेगा और विज्ञान के प्रति उसमें जागरूकता भी पैदा होगी। एडीसन बहुत पढ़ा लिखा या चोटी का वैज्ञानिक नहीं था। लेकिन उसने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सोचते हुए बिजली का बल्ब जैसे जनउपयोगी आविष्कार लोगों को दिये। नतीजे में आज बच्चा बच्चा एडीसन का नाम जानता है।
ये भी जरूरी नहीं कि इन बातों को गंभीर तरीके से बताया जाये। बहुत से रोचक तरीके हो सकते हैं लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के। मेरे ब्लाग पर वर्तमान में धारावाहिक रूप में चल रहा उपन्यास ‘प्लेटिनम की खोज’ कुछ इसी कान्सेप्ट पर आधारित है। जहां एक आम आदमी बड़ा साइंटिस्ट बनने के प्रयास में नये नये एक्सपेरीमेन्ट करता है। ये अलग बात है कि उसके नतीजे हमेशा उल्टे होते हैं। इसी नावेल में एक जगह के डायलाग हैं,
-- शर्ट की आस्तीन से उसने चमा साफ करते हुए कहा, ‘‘किसी भी वैज्ञानिक के घर में एक प्रयोगशाला अवश्य रहती है। तुम भी यही करना। इसके लिए जरूरी नहीं कि तुम अलग से कमरा रखो। अपने किचन से भी काम चला सकते हो। वैज्ञानिक उपकरण भी घर के सामान से बना सकते हो।’’
‘‘वह किस प्रकार?’’
‘‘अगर तुम्हारे पास परखनली नहीं है तो शीशे का गिलास ले लो। बर्नर नहीं है तो अगीठी से काम चल जायेगा। एसिड रखने के लिए अचार रखने का मर्तबान खाली कर दो। आग दहकाने की फुंकनी में चश्मे का लेंस लगाकर टेलीस्कोप बना सकते हो। कास्टिक सोडा न मिले तो खाने के सोडे से काम चला सकते हो। एसिटिक एसिड की जगंह पर सिरके से काम चल जायेगा। केमिकल टेस्ट के लिए चूहे पकड़ लेना और ---।’’
इसी प्रकार एक अन्य जगह पर, ‘‘हां, तो वैज्ञानिक बनने के लिए जरूरी है कि हर वस्तु का बारीकी से अध्ययन किया जाये। इसके लिए मैग्नीफाइंग ग्लास का उपयोग किया जा सकता है। अब जैसे यह पत्ती लो।’’ प्रोफेसर ने भूमि पर गिरी एक पत्ती उठायी, ‘‘यदि तुम बारीकी से अध्ययन करो तो मालूम हो जायेगा कि यह किस पेड़ की पत्ती है।’’
‘‘इसमें अध्ययन की क्या आवश्यकता है। यह बरगद के पेड़ की पत्ती है।’’
‘‘तुम्हें कैसे मालूम हुआ?’’ प्रोफेसर ने चौंक कर पूछा।
‘‘इसलिए क्योंकि सामने खड़ा पेड़ बरगद का है और यह पत्ती उस पेड़ में लबी पत्तियों के समान है।’’
‘‘ठीक है। किन्तु इस प्रकार का अवलोकन गवार करते हैं। तुम्हें बारीकी से निरीक्षण करने के बाद ही यह बात बतानी चाहिए थी। ---’’
‘प्लेटिनम की खोज’ साइंस फिक्शन है या नहीं यह समीक्षकों के बीच विवादास्पद हो सकता है। लेकिन अगर उपरोक्त दृष्टिकोण से देखा जाये तो उसे विज्ञान साहित्य कहा जा सकता है।
इस तरह अगर हास्य, एडवेंचर या रोमांस का पुट देते हुए वैज्ञानिक साहित्य रचा जाये तो विज्ञान को आम जनमानस के बीच रचते बसते देर नहीं लगेगी।